बुधवार, 7 दिसंबर 2011

कहां है मीडिया सर्वोकार ?


चौथे खम्भे का काम अब 4सी (क्राइम, क्रिकेट, सिनेमा और सेलिब्रटी) से पूरा नहीं हो पा रहा। 6सी का कांसेप्ट आ रहा है। दो अन्य है "करप्सन और कारपोर्टेजाइशन" 


एलपीजी (लिब्रेलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन) और सूचना विस्फोट के इस दौर में कोई कहता है कि सूचना में भ्रष्टाचार नहीं तो अविश्वासनीय ही है। भारत के पिछले कुछ दशक के आकड़ों को देखे तो साफ तौर पर जाहिर होता है कि जहां अन्य देशों में प्रिंट मीडिया का अस्तित्व खतरे में नजर आने लगा है वही भारत में पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की अपनी चमक बरकरार है। रेडियो  अपने मन के हिसाब से बज रहा है। तो बेव में भी समाचार विचार की धूम मचने लगी है। मीडिया के तेवर तो वैसे ही है बस बदला है तो उनका अंदाज और विषय। जिसे समय की मांग भी कह सकते हैं। तात्कालिक आकड़ों पर नजर डाले तो देश में 77,600 अखबार विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होते हैं। 58 करोड़ पाठकों की संख्या है। मतलब आधी आबादी अभी पढ़ने की आदि नहीं है। 550 चैनल है, जिनमें से 250 अभी अधर में हैं। 13 करोड़ 80 लाख लोगों के घरों में टी.वी. है। इनके साथ ही 50 हजार स्थानीय टी.वी ऑपरेटर है। ऐसे में अगर मीडिया के एक भी माध्यम में भ्रष्टाचार का कीड़ा लगा तो उसे पूरे मीडिया तंत्र में फैलते देर नहीं होगी। हुआ भी कुछ ऐसे ही राजनीति से शुरू हुआ भ्रष्टाचार आज समाचार विचार को निगल रहा है। आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में समाचार को भी व्यक्ति मनोरंजन के तरह ही देखने लगा है। उसे दो-चार लोगों के मरने वाली घटना से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। जब तक बड़ी तबाही न हो। क्योंकि यह भी आदत बन गई है। गाहे बजाहे ऐसी घटनाएं तो रोज ही होती है। कौन सा कोई सगा है हमारा। अब पड़ोसी के घर से धुंआ क्यों आ रहा है, इसकी चिंता फायरब्रिगेट वाले करें। नेता या पत्रकार तो दौरे पर ही नजर आएंगे। इतने के बावजूद भी इक्के दुक्के पत्रकार मिल ही जाएंगे, जो आज भी पत्रकारिता को जीवित रखे हैं। अब मजबूरी हो या हमारा स्वार्थ, नैतिकता तो धरासाई हो ही रही है। 

पेड न्यूज का कानसेप्ट भी भ्रष्टाचार के कारण ही मीडिया में आया है। जिसे जब जो भी खरीदना या बेचना है, सभी स्वतंत्र है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता सबको मिली हुई है। मीडिया को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है क्यों कि यह सरकार और आम जनता के बीच सेतु का काम करते है। समाज के हितों की रक्षा के लिए भी कार्यरत रहते हैं। अफसोस इस बात का है कि चौथे खम्भे का काम अब 4सी (क्राइम, क्रिकेट, सिनेमा और सेलिब्रटी) से पूरा नहीं हो पा रहा। 6सी का कांसेप्ट आ रहा है। दो अन्य है "करप्सन और कारपोर्टेजाइशन" यह बात अलग है कि लोकपाल की मांग पहले लगभग 50 दभा की गई होगी। लेकिन अन्ना आंदोलन की वजह से यह व्यापकता के साथ देश ही नहीं विदेश तक भी पहुंचा। इसमें सबसे ज्यादा रोल मीडिया का ही रहा। कारण साफ है 6सी और टीआरपी। इन सब के बावजूद भी मीडिया को हम पूरी तरह से भ्रष्ट नहीं कह सकते हैं। कुछ पत्रकार और संपादक है जो पूरी सच्चाई के साथ काम करना चाहते हैं। उन्हें भ्रष्ट करता है बाजार और ऐलिट वर्ग जो कतई यह नहीं चाहेगा कि मीडिया व्यापार में थोड़ा भी नुकसान हो। 
आज रेडियों की  पहुंच 99 प्रतिशत तक हो गई है। भारत का दुनिया में दूसरा स्थान है समाचार पत्रों की रोजाना प्रकाशित प्रतियों को लेकर। चीन में  इसकी संख्या 13 करोड़ है तो भारत में 9 करोड़ है। निजीकरण के दौर में भारत के 294 शहरों में 839 रेडियों एफएम शुरू होने वाले हैं। सोशल नेटवर्किंग तो मीडिया की सारी दीवारों को तोड़ उपभोक्ता, पाठक या दर्शक वर्ग को जागरूक बनाने का काम तेजी से कर रहा है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ समाज में अब हिंसा और क्रुरता में भी शासकों को मनोरंजन ही नजर आने लगा है। पूंजीवाद की दुनिया में साहित्य, कला और सूचना कमाई का जरिया बन गए हैं। दशर्क उपभोक्ता बन गया है। देश चलाने वाले जनता की संवेदनाओं के साथ खेल रहे हैं। इसमें उनका साथ दे रही है मीडिया जो संवेदना, जिज्ञासा, कौतुहल और मनोविज्ञान को अपना हथियार बना देश की जनता को ही पागल बना रही है। यह तो सोचने वाली बात है ही कि मनुष्य राजनेताओं के लिए सिर्फ मतदाता और बाजार के लिए सिर्फ उपभोक्ता ही समझा जाता है। इसके अलावा कुछ नहीं। ऐसे में भ्रष्टाचार की लगाम के लिए छोटा प्रयास और किसी भी कारण से उसमें मीडिया का साथ देना। शायद फिर से हमें उस पत्रकारिता की तरफ मोड़ सके जो आजादी के समय थी। समाज की प्रत्येक व्यक्ति की आजादी की पत्रकारिता होनी चाहिये। आज हम तरक्की तो कर रहे हैं। लेकिन अपने नैतिकता को खत्म कर के। भ्रष्टाचार और नैतिकता पर देश में मीडिया में लोग प्रवचन देते रहते हैं यह जानते हूए भी कि भारत पूरे विश्व में भ्रष्टाचार के मामले में तीसरे नंबर पर है। 

वर्तमान समय में मीडिया इस मुलभूत प्रश्न को कैसे पेश करती है? यह जानाना भी रोचक है। आज की मीडिया और उनके पत्रकार दोनों जनता को पुचकारने में लगे रहते हैं। जैसे इनसे ज्यादा हितैसी तो कोई हो ही नहीं सकता। फिर भी यह  नहीं कह सकते कि पत्रकारिता बची ही नहीं है। जो पत्रकार बचे हैं सच के साथ वो बाहरी दुनिया में जाने से कतराते हैं, कहीं वह भी बाकी सब की तरह उन्हीं के रंग में न रंग जाए। एलिट वर्ग अपनी मानवीय संवेदनाएं खोता जा रहा हैं। गांवो को तो तब्बजुम ही नहीं दिया जाता। पत्रकारिता की खबरे गांव में बसे भारत से ही निकलती है इसलिए इस ओर पत्रकारों को ध्यान देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों के संकट आ चुका है। पत्रकार न ही व्यवसायिक दक्ष हैं न ही कुशल। उनके प्रश्न और प्रस्तुति केवल पब्लिसिटी के लिए होते हैं। पत्रकारों को भारतीय अधिनियम की धाराओं और कानून का ज्ञान न के बराबर है जिससे पत्रकारिता दिशाहीन हो जा रही है। चाहे सत्ता हो या प्रशासनिक व्यस्था या कोई संस्था  व्यक्ति कुर्शी पर बैठ जाता है तो वह निर्णय भी अपने अनुसार ही लेता है। निर्णय की यह छुट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते ही सही गलत का भान न करते हुए वह कभी ऐसे काम भी कर जाता है कि न चाहते हुए भी वह मानव जाति का दुश्मन बन जाता है। जरा सोचिए, अंग्रेजो के समय के कानून आज तक चल रहे हैं। जिसका खामियाजा भूगत रही है आम जनता। यदि उनकी भूमिका का दायरा सिमित कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगया जा सकता है। विभिन्न राजनीतिक पाटिर्यों ने देश की हर चींज को बाजार में लाकर खड़ा कर दिया। आज तो भ्रष्टाचार से सब के पास पैसा या कह ले काला धन हो गया। मंत्री, अफसर, मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका, सेना, सांसद, उद्योगपति सभी आज भ्रष्टाचार में रंगे नजर आ जाएंगे। आज जो चीजे अच्छी बताई जा रही है वो बाजार में हैं। गाँधी की फोटो लगा कर, ईमानदारी का ढोंग किया जाता है। लेकिन उनकी नीतियों को अपनाने से कतराते हैं। 
अटपटी और चटपटी खबरें मीडिया की शोभ बढ़ा रहे हैं। पूरा का पूरा पेज या समय ही राजनीतिक पार्टियां खरीद लेती है। पार्टीयों और मीडिया का गटबंधन 100   साल से भी ज्यादा किसी भी पार्टी को देश पर राज करवा सकता हैं। पटना में देश के माने युवराज जाते हैं और खबर बनती है की लड़किया उनको देख कर चिल्ला रही थी जैसे की कोई हीरों हो। पत्रकार उसी को हेडलाइन बनाने में व्यस्त हो जाते हैं। लोकतंत्र के लिए तो जरूरी है वोटो के रूप में समर्थन पाना है वो पाने के लिए चाहे मीडिया को क्यों न भ्रष्टाचार में लाना हो, सब होगा। 
जब सच के लिए कोई जगह न बचती नहीं दिखी तो ब्लॉग लिख कर ही सच्ची पत्रकारिता की अलख जगानस शुरू हो गया। सही है राह कोई भी हो इरादा नेक होना चाहिए। नरेगा घोटाला, चारा घोटाला, लवासा घोटाला, अनाज घोटाला, चीनी घोटाला, राजमार्ग घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, संसद घोटाला, आदर्श घोटाला, बैंक घोटाला का सच छुपाने में मीडिया भी सबका का साथ बकायदा दे रही है। तहलका का सलेक्टिवली रिपोर्टिंग का सच, पत्रकारों के पदासिन होने का सच, नेपाल को मओवादियां के हाथो में सौप देने का सच, संसद में नोट कांड के सच पर, क्या सब मीडिया और समाज से छुपा हैं या हम जान कर अपनी आंखे बंद किए हुए हैं। क्यूँ अफजल और कसाब को अभी तक फंसी नहीं हुई है। अभी हल ही में आई  "बोल"  फिल्म मीडिया के लिए अच्छा उदाहरण है।
मीडिया खुद पर लगाम लगाने की बात करता है। क्या यह संभव है। भ्रष्टाचार जहां विकृतियों को जन्म देता है। वहीं वो गरीब को और भी गरीब बनाता है। सरकार जिस बेशर्मी के साथ भ्रष्टाचार को पनाह दे रही है और सी बी आइ, आयकर विभाग भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। कभी तो वो समय आएगा ही जब सब जग जाहिर होगा। भ्रष्टाचार कर आचार देखने को मिलेगा। तब और भी चटकारे लेगी यह मीडिया। सभी मामलो में सरकार और मीडिया को भ्रष्टाचार को एक नजर से देखना चाहिए। सरकार मीडिया का मुह बंद रखने के लिए जो विज्ञापन देती है वो भी हमारे आम जनता मध्यम वर्ग की कमाई के होते हैं। मीडिया वाले क्या करते  हैं  उनका हिसाब जनता या सरकार के पास क्यों नहीं होता हैं। अन्ना दल के सदस्यों को बारी बारी निशाना बनाया जाना। यह  सिर्फ राजनीतिक सामाजिक आंदोलन का हिस्सा नहीं है बल्कि राजनीति और मीडिया तंत्र और समाज के बीच जो लड़ाई चल रही हैं। उसमें समाज के हार के रूप में भी देख सकते हैं। लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म भले ही न हो, लेकिन वह सवालों की जबाबदेही के लिए, सूचना का अधिकार कानून की ही तरह एक कारगर हथियार जरूर बन सकता है। अन्ना दल को अब वक्त का इंतजार करने के साथ ही आगे बढने की जरूरत हैं। नहीं तो अंत का पूर्ण अंत करने में एलिट वर्ग को देर नहीं लगेगी। 

आज देश की आजादी के बावजूद भी क्या बेगुनाहों, मजबूरों के साथ इंसाफ हो रहा है, मजदूरों को उचित मजदूरी मिल रही है, बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है और न जाने ऐसे ही कितने सवाल हैं जिसका जवाब है न मीडिया के पास है न सरकार के पास। इस देश में अमीर और भी अमीर होता जा रहा है और गरीब, गरीब होता जा रहा है। सर्वशिक्षा अभियान से बच्चों के किताबें और खाना की व्यवस्था तो हो गई है। लेकिन क्या आज ऐसे स्कूल नहीं है, जहां बच्चों के लिए आने वाला राशन किसी और के पास जाता हो? देश में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, मजदूरी कर रहे हैं। सबसे ज्यादा परेशान युवा हैं। पढ़ सका वो भी, और जो न  पढ़ सका वो भी। नौकरी के लिए दर दर भटक रहा है, रिश्वतों के बिना नौकरी लगना असंभव सा ही हो गया है। सरकार ने एक न्यूनतम मजदूरी तय कर रखी है मगर करोड़ों की संख्या में ऐसे नौकरीपेशा हैं जिन्हें सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी से कम पैसा मिलता है। तनख्वाह इतनी होती है कि एक वक्त ही पेट भर खा पाते हैं तो अगले वक्त का सोचते हैं । यही हाल है पत्रकारों का भी। आए दिन ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं की फलां गांव में फलां व्यक्ति ने गरीबी से तंग आकर जान दे दी। हजारों टन अनाज रखे-रखे सड़ जाता है, तो कहीं भूख से किसी की मौत हो जाती है। शर्म की बात नहीं तो और क्या है। किसानों के देश में किसानों के साथ ही धोखा हो रहा है। उनकी जमीन छीनी जा रही है। कहा सो जाती है मीडिया ऐसी खबारों के समय। नेताओं की यात्रा किसान की मौत से ज्यादा जरूरी है। आज हर तरफ से भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं। जिसे जब मौका मिला उसने देशवासियों को लूटा है। हमारे देश में बुद्धिजीवियों  की कमी नहीं है। मगर अधिकतर या तो दिखते ही नहीं या फिर उनसे सिर्फ उन्हीं लोगों को लाभ होता है जो दांव पेंच में माहिर होते हैं। जो गरीब हैं उन्हें इंदिरा आवास का घर नहीं मिल रहा, तो मीडिया का पूरा घराना  हैं। गरीबों का नाम बीपीएल में नहीं है और कार्ड के मजे दूसरे ही ले रहे हैं। भूख से लोग मर रहें है, किसान खुदकुशी कर रहें है, बच्चियों को कोख में ही मार दिया जा रहा है, बाल मजदूरी हो रही हैं। ऐसी परिस्थिति में कहा है आजादी मीडिया और देश दोनों की। क्या गांधी जी का सपना कभी पूरा होगा? पत्रकारिता  पीत फिर प्रेत अब पेज-3 में तब्दील हो गई है। पी से पब्लिक का  तो कही नामोनिशा नहीं है। बेईमानी इतनी ज्यादा हावी हो गई है कि इमानदारी के लिए जगह ही नहीं बचती है, ऐसे में मिडिया में भ्रष्टता वाकई खटकती है | क्योंकि पूरा माकन खम्भों पर ही टिका होता है| एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ने लगता है| भारत में मीडिया कि स्थिति में अभी सही मायने में  और  परिपक्वता कि जरूरत है| उदाहरण में सहारा समूह ने भ्रष्टाचार कि अपनी एक गलत खबर के लिए 9 साल बाद क्षमा मांगी|  जरुरत है मीडिया को सच्चाई से अवगत करते हुए नींद से जगाने की |

सुषमा सिंह 

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

आगाज़

अंधे बाप के बेटों ने ये कैसा अनाचार किया |
लड़ न सके वीरों से तो नारी पर अत्याचार किया ||
भरी सभा में खीच कर लाया भाभी का अपमान किया |
चीर हरण करने की कोशिश बीच भरे दरबार किया ||
असहाय पड़े थे वीर योद्धा कहने को लाचार भीष्म |
औरों को क्या कहे जहा भीष्म पितामह तक हुए  लाचार ||
द्रौपदी न छोड़ी अपने प्रिय सखा को , जिसका साडी फाड़ उपचार किया |
क्रांत भावना से इस दुःख में पुकार-पुकार कर आह्लाप किया ||
दौड़ पड़े नंगे पग से अपनी बहन का सम्मान किया |
द्रौपदी की साड़ी को साड़ी ही नहीं अम्बर के सामान किया ||
खीच-खीच कर हारे थक कर जब चूर हुए |
भरी सभा में खड़े खड़े सब लज्जा से चकना चूर हुए ||
बची लाज श्यामा की जो प्रिय सखा को याद किया |
अपनों से ज्यादा जो श्रद्धा, विश्वास पर आधार मिला ||
खोल दिया अपने जुड़े को महाभारत का निर्माण किया |
कर प्रतिज्ञा पूरी विश्व को नया अभिमान दिया ||

by shitala ji

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

बच्चों के सपनों को साकार करती संस्था


अशिक्षा एक ऐसा कारण है जो किसी भी देश के विकास में बाधा का काम करता है। यही वजह है कि माइक्रोसाफ्ट में कार्यरत ‘जाॅन वुड’ अपनी नौकरी छोड़ सबसे पहले 2002 में नेपाल के एक छोटे से गांव में ‘रूम टू रीड’ की नींव रखी। धीरे-धीरे यह सफर बढ़ता गया और आज दुनिया के 9 देशों में यह संस्था काम कर रही है। भारत में भी आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट, राजस्थान, उत्तरांचल और दिल्ली जैसे नौ राज्यों में इसका काम सरकार के साथ मिलकर कुशलता स ेचल रहा है। हालांकि भारत में इसकी शुरूआत 2003 में राजस्थान और दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लाइब्रेरी बनने के साथ हुई। भारत में एक मिलियन बच्चों के साथ काम कर रही इस संस्था ने अभी तक 4,120 लाइब्रेरी बनवाई है और 7,86500 किताबों को सात भारतीय भाषाओं में प्रिंट करा कर बच्चों तक उपलब्ध कराया है। 2,882 लड़कियों को अपने प्रोग्राम से जोड़कर उन्हें शिक्षित और आत्म निर्भर बनानेे का प्रयास किया है। इस संस्था द्वारा मूल रूप से चार कार्यक्रम चलाए जाते हैं। पहला है ‘रीडिंग रूम’, दूसरा ‘लोकल लैग्वेज पब्लिसिंग’, तीसरा ‘स्कूल रूम’ और चैथा है ‘लड़कियों की शिक्षा’।

पूरे भारत में 76 कार्यकताओं के साथ काम कर रही इस संस्था की भारत मंे निदेशक सुनीशा आहुजा कहती है कि लड़कियों की शिक्षा के प्रोग्राम के तहत जब हम बिकानेर के तीन गांव में सर्वे किया। उसके बाद वहां बालिका शिविर लगाया। जिसमें लड़कियों की संख्या 72 से 48 हो गई थी। क्योंकि वह ऐसी लड़कियां थी जो कभी स्कूल गई ही नहीं थी। उनका परिवार और समुदाय उनकी पढ़ाई में सहयोग नहीं करता था। वहां हम आज भी काम कर रहे हैं। लेकिन शुरूआती दौर में ही हमे यह सीख मिली की हमें सिर्फ बच्चियों के पढ़ाई के स्तर पर ही नहीं उनके परिवारि और समुदाय केस्तर पर भी काम करना होगा। इसी का परिणाम है कि हम स्कार्लशिप देने के साथ ही उनके पूरे समुदाय के साथ जुड़ कर काम करते हैं। सबसे पहले हमने लाइब्रेरी का कार्यक्रम 2003-04 में 65 स्कूलों के साथ शुरू किया था। आज इनकी संख्या चार हजार से ज्यादा हो गई है। जहां विभिन्न प्रकाशकों से किताबे मंगवाने के अलावा खुद भी प्रकाशन किया जाता है। बच्चों की रुचि के अनुसार 100 नई कहानियों का प्रकाशन तीन भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी और तेलगु में किया गया है। इससे बच्चों के लिए लिखने वालों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

इस संस्था की इस वर्ष के विदेशी फन्ड की बात करें। तो 75 प्रतिशत मदद विदेश का ही है। इस मामले में आहुजा जी मानती है कि किसी भी देश का कोई भी बच्चा अगर शिक्षित है तो इसका प्रभाव दुनिया पर होता है। मदद कहीं से भी मिल रही हो। जरूरी यह है कि हम मिल कर काम करें। जिससे सबका विकास हो सके। भारत में ही चार अन्य राज्य सरकार ‘रूम टू रीड’ को अपने प्रोग्राम में शामिल करने और 15-20 हजार स्कूलों में कार्यक्रम चलाने का प्रस्ताव दे रही है। उनमें झारखंड भी है। संस्था किसी भी राज्य में कार्य करते समय तीन साल का एग्रामेंट करवाती है। जिसके तहत सरकार को साथ मिलकर काम करना होता है। बच्चों को किताबें दिलाना, पुस्तकालय खुलवाना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, बच्चों के विकास के लिए अन्य गतिविधियां करना मुख्य रूप से शामिल होता है। सरकार के साथ काम करने का कारण यही है कि जब संस्था वहां से काम पूरा कर ले उसके बाद स्कूलों को ज्यादा परेशानियों का सामना न करना हो।

इस वर्ष ही संस्था ने दो रिसर्च किए। जिसका उद्देश्य यह जानना था कि 12वीं की बाद लड़कियां अपने भविष्य के लिए क्या करना चाहती है। और इसके लिए उनकी तैयारी किस प्रकार कराई जा सकती है। कोई आगे पढ़ना चाहती है जो कुछ अपना काम शुरू करना, कुछ नौकरी करना चाहती है। ऐसे में पिछले साल ही छोटा सा पाइलेट प्रोजेक्ट 300 बच्चियों के साथ शुरू किया गया। उसमेें उनकी कार्य क्षमता को निखारने के अलावा उनकी मूल शिक्षा को ठोस बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है। जिससे वह आगे जो भी करना चाहे कर सके। इसके लिए उन्हें स्कार्लशिप भी दिया जाता है। इसके चयन का आधार है। वह जगह जहां महिला शिक्षा दर राष्टीय महिला शिक्षा दर से कम हो और ऐसे स्कूल जहां अधिक संख्या में लड़कियों द्वारा पढ़ाई छोड़ दी गई हो। अब एक-एक बच्चे का चुनाव करने की जगह स्कार्लशिप के लिए उस पूरी कक्षा को ही चुन लिया जाता है।

अभी तक इस संस्था से लगभग 30-35 लड़कियां 12वीं पास कर चुकी है। उनमें से कुछ ने एनजीओ में ही काम कारना पसंद किया तो कुछ ने बीपीओ में और दो लड़कियां काॅलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। देश-विदेश में कार्यात यह संस्था अपनी समाजिक कामों के लिए लगभग दस बड़े सम्मानों से नवाजी जा चुकी है।  

बुधवार, 24 अगस्त 2011

हम सब अन्ना (हम सब भारतीय है)

अन्ना के आन्दोलन से देश में व्याप्त एकता को जगा दिया है .कोई फर्क नहीं पड़ता हवा का रुख क्या हो. अब क्या हमें भ्रष्टाचार मुक्त भारत मिलेगा ............




शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

भारत की नदियां


 चित्रकूट धाम की सुन्दर छवि उन सभी लोगों के जहन में होगी जो पहले गए हैं| लेकिन अब मन्दाकिनी नदी के किनारे की हालत यह तस्वीर बाया कर रही है| भारत की नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है | क्या कोई है जो इन्हें बचाना चाहता है ?

गांधी टोपी से सधती गांधी शिक्षा की राह

सुषमा सिंह\नरसिंगपुर (मध्य प्रदेश)



रोटी, कपड़े और मकान की तरह ही आज शिक्षा व्यक्ति की मूल जरुरत  बन गई है। शिक्षा  की परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से ही चली आ रही है। नालंदा जैसे गुरूकुल की परंपरा भी भारत में ही रही। लेकिन आज बदलती दुनिया के साथ शिक्षा में क्या बदलाव आया है? सरकारी और गैर सरकारी तौर पर खुलते स्कूलों में शिक्षा  का स्तर गिरता जा रहा है और अभिभावकों की परेशानी बढ़ती जा रही है। शहरों से लेकर गांव तक विभिन्न प्रकार की समस्या शिक्षा  के क्षेत्र में आ रही है। कभी दाखिले को लेकर तो कभी पढ़ाई के खराब स्तर को लेकर।
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अंग्रजों के समय से चला आ रहा प्रदेश का एकमात्र अनोखा विद्यालय सिंहपुर में स्थित है। इस विद्यालय की स्थापना काल 1868 से ही बच्चे स्कूल गांधी टोपी लगाकर जाते हैं। विगत 143 साल से यह परंपरा चली आ रही है और आज भी कायम है। इस स्कूल का नाम शासकीय उत्तर बुनियादी शाला है, जो गांधी टोपीवाले स्कूल के नाम से प्रख्यात है। स्कूल की स्थपना के बाद से ही पढ़ाई करने वाले छात्रों को टोपी पहन कर आना अनिवार्य किया गया था। टोपी लगाना कभी इनकी मजबूरी नहीं रहीं। यहां सिंहपुर के अलावा आस-पास के दर्जनों गांव की तीन पीढ़ियों तक ने अध्ययन किया है। अब तो कई बच्चे ऐसे हैं जो अपने पिता, दादा और परदादा के पढ़ने वाले इस स्कूल में अध्यनरत है। प्राथमिक माध्यमिक स्तर तक की कक्षा वाले इस स्कूल में लगभग 198 छात्र व 08 शिक्षक है जबकि 2004 में 350 के करीब छात्र और 13 शिक्षक थे। कुछ शिक्षक इसी विद्यालय में पढ़े और अब नई पीढ़ी को सही शिक्षित कर रहे हैं। इस स्कूल की खासियत यह है कि 21.7.1869 से लेकर आज तक के पूरे रिकार्ड को भी संजो कर रखा गया है। 
शैक्षणिक गुणवत्ता के मामले में भी इस विद्यालय पीछे नहीं रहा। यहां अध्ययन करने वालों छात्रों ने शिक्षा, चिकित्सा, प्रबंधन, कंप्यूटर इत्यादि के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यही से पढ़े शिवकुमार महाजन इंग्लैंड में चिकित्सक है, तो विश्वम्भर दलाल सोनी कोल डिपो में उंचे ओहदे पर कार्यरत है। इनके अलावा भी अन्य छात्र आज इस सरकारी स्कूल का नाम ऊँचा कर रहे हैं। यह एक ऐसा विद्यालय भी है, जहां के  अपने कर्तव्यों व दायित्वों के कारण समय-समय पर राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। शेख नियाज मोहम्मद को सन् 1963 में  राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के द्वारा पुरस्कृत किया गया। सन् 91-92 में ही देवलाल बुनकर व 95-96 में चौधरी नरेन्द्र कुमार शर्मा भी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुए। बच्चों और उनके अभिभावकों को लगता है कि टोपी पहनने से बच्चों में अनुशासन की भावना आती है। वह ऐसा महसूस करते हैं कि टोपी पहनने के बाद विद्यार्थी की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर मुड़ जाती है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत शिक्षक महेशचन्द्र शर्मा अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि उन्हें याद है जब सन् 1948 में महात्मा गांधी के वर्धा आश्रम की शुरूआत हुई थी और बुनियादी शालाओं में सूत कातना, गलीचा बनना शुरू हुआ था। तब उन्होंने इस विद्यालय में टोपी पहनने की परंपरा को और सुदृढ़ बनाया। वह एक संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि सन् 1968-69 me शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने एम.डी. चौबे इस बात पर अड़ गए कि उनका बालक देवेन्द्र टोपी पहनकर स्कूल नहीं जाएगा, तब उन्होंने उसके पिता से अनुरोध किया कि आप बालक देवेन्द्र को कल से स्कूल न भेंजे। यदि आप विद्यालय की परंपराओं का पालन नहीं करेंगे, तो छात्र के लिए स्कूल में जगह नहीं है।

इसी स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक लेख राम दूबे का कहना है कि बुनियादी शाला गांधीवादी  सिद्धांत पर आधारित है। पहले यहां गांधीवादी नीतियां थी। लकिन अब सरकारी नीतियां लागू हो गई है। गार्डनिंग, दरी-गलीचे, चाक आदि बनाने के लिए पहले पैकेज भी मिला करते रहें। अब सारी सुविधाएं बंद कर दी गई है। 2-3 एकड़ के खेतों में काम किया करते थे। लखनादउ, अमरबाड़ा में भी इस प्रकार की बुनियादी शालाएं बनीं। वह अब नाम के लिए ही बची है, टोपी का तो वहां कुछ लेना देना है नहीं और कुछ भी नहीं बचा है। सिंहपुर बुनियादी शाला में टीचर भी कम है। 5 प्राइमरी टीचर और 3 मिडिल स्कूल में हैं। 
मिडिल स्कूल तक की इस शाला के हेड मास्टर आई.पी. सोनी है जो नवम्बर में सेवा निवृत भी हो जाएगे। उनका कहना है कि यहां की इमारते भी अग्रेंजो द्वारा ही बनवाई गई है। उन्होंने 1955 से 64 तक इसी स्कूल में पढ़ाई की है। वह भी टोपी लगाकर स्कूल जाते रहे। उनके रिकार्ड के अनुसार पूरे स्कूल में मात्र 2 बच्चें सामान्य से और बाकि सभी पिछड़ी जाति के हैं। यहां पहले से बच्चे कम हुए है, इसका कारण यही है कि हर 1 किलोमीटर पर प्राइमरी और हर तीन किलोमीटर पर मिडिल स्कूल पर खोला जा रहा है। कंप्यूटर के लिए टेक्निकल टीचर नहीं है। 6 कंप्यूटर स्कूल में पड़े खराब हो रहे है। उसमें सरकारी तौर पर रेड हैट इन्सटॉल किया गया। जो किसी के पल्ले नहीं पड़ता। वहां के अन्य शिक्षकों को इसके बारे में तनिक भी जानकारी नहीं है। जिसे सरकारी तौर पर प्रशिक्षित किया गया। उनका तबादला कर दिया गया। मध्यान भोजन से भी कोई खास लाभ नहीं है। उनके अभिभावक सहयोग नहीं करते। ऐसी स्थिति में एबीएल स्कीम का आना कितना सार्थक हो सकता है। जरूरी यह नहीं है कि बस्ता लाए या न लाए। मूल बात यह होनी चाहिए कि पढ़ाई का स्तर क्या हो, बच्चा वहां से बाहर निकल कर कितना कामयाब होता है। प्रोत्साहन के तौर स्कीम चलाने से ज्यादा आवश्यक उन्हें सही रूप में लागू करना है। बच्चे अब अपने समय का सदुपयोग नहीं कर पाते। हर साल ट्रेनिंग में पढ़ाने की पद्धति बदलते रहना कारगर नहीं हो रहा है। टोपी के बारे में बताते हुए कहते हैं कि पंजाब में पगड़ी और गुजरात-राजस्थान में साफा जैसे ही बुनियादी शाला की टोपी का महत्व है। आई.पी. सोनी ने सरकारी शाला की खराब हालत को बया करते हुए कहा कि शिक्षा का स्तर उठाना है तो पुरानी शिक्षा पद्धति को साथ लेकर काम करना होगा।    

मंगलवार, 21 जून 2011

बदल दो जिंदगी

शिवा और अभिजीत तिहाड़ जेल में बंद कैदी के ये वो दो बच्चे हैं, जो अपनी नयी जिंदगी की तलाश सिस्टर सेलीन के साथ कर रहे हैं

तीन पहिये का साथ


हम रिक्शे पर सवार होकर अपनी मंजिल तक तो पहुंच जाते हैं | लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इन रिक्शे वालो की जिंदगी कैसे चलती है| पैसो और छोटी-छोटी बातों को लेकर आये दिन उनसे झड़पे होते तो हम रोज ही देखते हैं | उसी बीच दिन भर की मेहनत के बाद भी उन पर पुलिस के डंडे बरसते  भी देखा जाता है| इनके परिवार का जीवन कैसे चलता है, अगर यह बीमार हो जाये तो उस दिन क्या होगा?
इन सब के बारे में भी सोचने की जरुरत है| नोएडा में  एक रिक्शे वाले को बेवजह कुछ गुर्गो द्वारा परेसान किये जाने की घटना को देखकर केरल की रहने वाली 67 वर्ष की सिस्टर सेलीन ने उनकी मदद करने की ठानी जो 1965 में ही नून बन गई थी| अपने रिटायरमेंट के बाद जब वह वापस भेल स्कूल में प्राइमरी की  इंचार्ज बनी कर आई , तब 4 अक्टूबर 2005 को उन्होंने पहली बार लाटरी माध्यम से जरुरत मंदों को रिक्शा देना शुरू किया | जिसकी कीमत रिक्शेवाले पहले तीन माह में 50 रुपये देकर फिर धीरे-धीरे साल भर में पूरा बकाया अदा कर उसे अपना बना लेते हैं| सिस्टर का कहना है कि ऐसा करने से उन सब को यह नहीं लगेगा कि यह रिक्शा उनका नहीं है| इन रिक्शो कि गिनती आज ३०३ तक पहुंच गई है, जिनमें से 277 से ज्यादा रिक्शे वालो ने पैसे दे दिए हैं| सिस्टर के पास रिक्शे के पैसे किसी फंड या डोनेसन से नहीं आते हैं| यह नेक काम वह खुद और अपने सहयोगियों कि मदद से करती है| शुरूआत में कुछ पब्लिसर्स ने भी उन्हें मदद किया| सिस्टर का मानना है कि ऐसा करने से वह अपने लक्ष्य से भटकेंगी नहीं| ऐसे ही सामाजिक कामों से उन्हें इनाम के रूप में करीब ढाई लाख रुपये मिले, जिसे उन्होंने रिक्शे खरीदने के साथ उनके परिवार कि मदद में भी लगा दिए| सिस्टर को अपने जन्म दिन के तोफे के रूप में अरविन्द यादव जी से रिक्शा मिला और मंगलवार के दिन यह पहला रिक्शा किसी कि मदद के लिए दिया गया| यही कारण है कि हर महीने कि मीटिंग मंगलवार को एक टी पार्टी कि तरह राखी जाती है| जहां इन्हें ट्रेफिक रूल्स के साथ ही अच्चा इंसान बनाने कि सीख दी जाती है| बैंको में इनके अकाउंट खुलवा दिए जाते हैं| इससे आगे  बचत करने के साथ ही अपने मुश्किल दिनों के लिए जमा पूंजी इक्कठा कर पाते हैं| यहां पर इन्हें एक-दुसरे कि मदद करना भी बताया जाता है | रिक्शा वालो के साथ ही उनके परिवार का ध्यान भी सिस्टर रखती है | उनके बच्चो को भी पढ़ाती है | सुरेश नामक बुंदेलखंड वासी रिक्शा वाला कहता है कि सिस्टर कि मदद से आज यह रिक्शा हमारा है| वह हमें बताती है कि किसी के साथ भी बुरा व्यवहार मत करना| वह हमारे परिवार का भी ख्याल रखती है| अपना पैसा अब हम अकाउंट में जमा करते हैं| 
इसके अलावा सिस्टर ने तिहाड़ जेल में बंद कैदियों के 29 बच्चों को 1997 में 'आशा सदन' लायी, जहां इनके द्वारा ऐसे बच्चों को शरण दिया जाता है| नोएडा लाने का उद्देश्य उन्हें अच्छी शिक्षा और परवरिश देना है | सिस्टर का सपना उन्हें आत्म निर्भर और नेक इंसान बनाने का है |  यह वो बच्चे है जिनके मां-बाप किसी अपराध के कारन जेल में बंद है| इनके परवरिश कि पूरी जिम्मेदारी आशा सदन पर है | बाद में इन्हें आगे कि शिक्षा के लिए पहली आइपीएस महिला अधिकारी किरण बेदी कि संस्था 'इंडियन विसन फाउन्डेसन' भेज दिया जाता है | 
सिस्टर कहती है कि मुझे मदद करने कि प्रेरणा केरल में ही फादर वर्गीश से मिली| उन्हें सामाजिक कार्य के लिए नवरत्न अवार्ड से भी नवाज़ा गया और १०१ वोमेन बुक में भी उनका नाम शामिल किया गया| सिस्टर बताती है कि यह सब इतना आसान नहीं होता है| पहले तो रिक्शे वाले इस काम में रूचि नहीं ले रहे थे | अब तो संख्या बढ़ती जा रही है | पहले सेक्टर 17 फिर 33 और अब तो नजीबाबाद में भी रिक्शा देने कि यह कवायद शुरू हो गई है| अभी नजीबाबाद में 55 हज़ार रुपये इस मुहीम को शुरू करने के लिए दिए गए है | उन्होंने बताया कि मीडिया में खबर आने के बाद तीन रिक्शे के पैसे मदद के रूप में आ गए | अलग-अलग लोग हर बार मीटिंग और खाने कि व्यवस्था के लिया आगे आते रहते हैं | क्रिसमस भी सिस्टर इन्हीं लोगो के साथ मानती है| किसी अमुक ने उनपर रिक्शेवालों को क्रिसचन बनाने का आरोप लगाया| लेकिन सच को नहीं झूठ्लाया जा सकता है| एक भी ऐसा रिक्शे वाला नहीं मिला जिसने धर्म परिवर्तन किया हो| सिस्टर कहती है कि समाज सेवा का काम तो सरकार का है | अगर हम कर रहे है तो क्या गलत है| जो लोग किसी के लिए अच्छा नहीं कर सकते है तो चुप रहे, जो अच्छा काम कर रहे है उन्हें करने दे | यहां कोई भी मेरा नहीं है लेकिन सब अपने है| मैं तो इन सब को अच्छा इंसान बनाने कि कोशिश कर रही हूँ | यह जिम्मेदारी समाज कि भी बनती है कि वह रिक्शेवालो से ठीक से पेश आये|

शनिवार, 7 मई 2011

कब तक होता रहेगा बच्चों के साथ अन्याय!


भारत में  बाल अधिकारकर्मी के रूप में प्रख्यात कैलाष सत्यार्थी है। वैसे तो इन्हें इनके कार्यों के बतौर कितने ही राष्ट्रीय  एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। लेकिन 1980 से इन्होंने बाल अधिकार के लिए जो जंग छेड़ी है। उसके अंतर्गत वर्तमान समय में लगभग 80,000 बच्चों को बचाया जा सका है। इस प्रयास को आगे बढ़ाने के उद्देष्य से 22 मार्च की शाम  इंडिया गेट पर कैन्डल लाइट मार्च किया गया। जिसमें ‘अब कोई मुहिम नहीं’ का स्वर एक साथ गुंज रहा था। इस दिशा में कैलाश सत्यार्थी से हुआ साक्षात्कार प्रस्तुत है-

प्र. - आप लोगों द्वारा 22 अप्रैल को कैन्डल लाइट मार्च करने का क्या मकसद था और कितने लोगों का समथर्न प्राप्त हुआ?
उ. - दिल्ली में पिछले सप्ताह 9-10 साल के एक बच्चे को उसके मालिक ने बहुत ज्यादा पिटाई करते हुए दीवार पर दे मारा और हत्या कर दी। वह और उसके साथ तीन बच्चे मोहिनी बिहार से काम करने के लिए दिल्ली के एक फैक्टरी में लाए गए थे। वह तीनों बच्चे छुड़ा लिए गए है और हमारे पास सुरक्षित है। इस शर्मनाक घटना से राजधानी में ऐसे चेहरों का पर्दाफास हो रहा है जहां से सभी नीतियों का निर्धारण किया जाता है। इसी घटना के विरोध में पौने सात से लेकर पौने नौ बजे रात्रि में  5,000 मोमबत्ती जला कर इंडिया गेट पर कैन्डल लाइट मार्च किया गया। ‘अब कोई मुहिम नहीं’ के इस कार्यक्रम में जनता से अपील के फल स्वरूप बड़ी संख्या में कॉल और मैसेज भी आए। साथ ही संकल्प भी लिया गया कि - बच्चों के द्वारा बनाई गई चीजों का बहिष्कार करेंगे, ढाबों आदि में बच्चों के द्वारा दी गई सेवा नहीं स्वीकार करेंगे और जो लोग बच्चों से काम करवाते हैं, उनका विरोध करेंगे।

प्र. - भारत में कुल कितने बाल मजदूर हो सकते हैं? 
उ. - भारत में करीब छः करोड़ बच्चे बाल मजदूर और एक करोड़ बच्चे बधुवा मजदूरी करते हैं। 

प्र. - भारत की राजधानी दिल्ली में कितने बाल मजदूर होंगे?
उ. - अगर राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां लगभग पांच लाख बच्चे बाल मजदूर है। 

प्र. - बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए क्या-क्या कदम उठाएं जा रहे हैं?
उ. - सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून को इमानदारी से लागू करें। बच्चों से ऐसे काम कराने वाले मालिको को सजा मिले, शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो, बड़ी कंपनियों का सामाजिक दायित्व है कि बाल मजदूरी न कराएं। न्याय पालिका, सुप्रीम कोर्ट और कानून की मदद से हमने 80,000 बच्चों को मुक्त  कराया है। पुनर्वास की योजना को भी अच्छे से लागू करने की जरूरत है। हमारे यहां पुनर्वास के तौर पर अपने तीन आश्रम है- पहला  मुक्ति आश्रम दिल्ली में है और इसमें 119 बच्चे वर्तमान में है। इसमें बालक और बालिका दोनों है। दूसरा बाल आश्रम - यह भी दिल्ली में है लेकिन इसमें सिर्फ बालक ही रहते हैं। तीसरा बालिका आश्रम - यह राजस्थान में है। यहां सिर्फ बालिकाएं रहती है। बाल और बालिका आश्रम में लगभग 100 बच्चें हैं। 

प्र. - 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना दण्डनीय अपराध है लेकिन सरकार कानून को लागू करने में असमर्थ है। इसका क्या कारण है? 
उ. - सरकार को लागू करना पड़ेगा। हमने कई बार मामला अदालत तक लाया, राजनीतिज्ञों को भी सामने लाए। इसमें जनता ने भी समर्थन किया। इंडिया गेट पर 5,000 मोमबत्ती मार्च के तौर पर जलाई गई। बाद में भी लोग आते रहे और हमारा समर्थन किया। कानून को लागू करना जरूरी है। 

प्र. - क्या ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून आने के बाद से बाल मजदूरी पर कोई प्रभाव पड़ा है? 
उ. - नहीं, कोई असर नजर नहीं आया। राज्यों में नियमावली बनी है। वह भी सिर्फ कागजी तौर पर, वास्तव में कानून लागू नहीं है। 

प्र. - आप लोग छापे मार कर बाल मजदूरों को आजाद करते हैं। लेकिन पुनर्वास नहीं होता जिससे वह वापस वहीं चलें जाते हैं। इस दिशा में क्या किया जा रहा है?
उ. - हम सरकार पर दबाव बनाते हैं ताकि वह पुनर्वास करें। पुनर्वास में किसी भी बंधुआ मजदूर को 20 हजार दिया जाता है, जो उसके अभिभावक के पास रहता है। और मालिक पर इस जुर्म में 20 हजार तक का जुर्माना लगाया जाता है जो बच्चे की पढ़ाई में खर्च होता है। यह प्रवधान केंद्रीय पुनर्वास योजना और बंधुआ मजदूरी अधिकार के तहत है। हमारे द्वारा 20 हजार बच्चों को बिहार में पुनर्वासित किया जा चुका है। 

प्र. - बचपन बचाओ आंदोलन पर कुछ विस्तार से बताइए?
उ. - बचपन बचाओ आंदोलन 1980 से प्रारंभ किया गया। जिसमें बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, शिक्षा का अधिकार आदि कानून के लिए संघर्ष जारी है। हम केन्द्र और राज्य को नए कानून बनाने के लिए भी दबाव डालते हैं। हम जो काम कर रहे हैं इसमें जनता का समर्थन जरूरी है।