Wednesday, November 11, 2009

सीता की आस

हे राम तुम्हारे आँगन में,
क्यों सीता का अपमान हुआ|
क्या पाप किया था उसने,
जो तुने उसको दण्ड तुने उसको दिया||
कर ना सके तुम उसकी रक्षा,
फिरते थे जंगल में मारे-मारे|
फिर भी दण्ड मिला उसको,
तुम बन बैठे आंखों के तारे||
कैसे थे तुम आदर्श पुरुष,
जो ना पवित्रता को पहचान सके|
औरों का दोष मढा उस पर,
अपने को निर्दोष किया|
पैरों से थी ओ भारी,
फिर भी तूने परितत्याग किया|
छोड़ घने जंगल में उसको,
कैसे तूने अन्याय किया ||
लखन ही था तेरा भाई,
जिसने माँ जैसा सम्मान दिया|
अरे तू निकला कितना कायर,
उसी के हाथों पाप किया||
दया नहीं तुमको आई,
कहलाते हो दया के सागर|
जब तूने अपने से ही छल किया,
हम तो हैँ सागर के गागर||
कैसे आस लिए मैँ तुमहारी महिमा गाउँगी,
सीता तो समा गई धरती में ,मैं धरती पर ही मर जाउंगी|
हाथ ना आयी सीता तुझको,
तेरे कर्मों का फल जो तुझे मिला||
रोते विलखते राज किया,
शीतल जल का ही आस मिला||
-सुषमा सिंह

3 comments:

  1. aapne mudd aur shiddt ke sath es blag ko tayar kiya hai.yah kavita naresh mehata ki kvita sanshay ki ek rat ki yad dilati hai.jisme sita aapne nirasepan ko vyakt ki hai,vhi is kavita ko tayar krne vala kavitri aur blogger. mai ese tarah kavita likhane vali kavitri se prasanchit hun vah is kshetra mai aapne manjil ko prapt kare yahi meri shubhechcha hai.khuda ye gun ise de .

    ReplyDelete
  2. good poem.keep it continue.

    ReplyDelete
  3. aapke kavita na man ko chu liya

    ReplyDelete