गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

अधिकारों से वंचित करता केन्द्रीयकरण


सुषमा सिंह
ग्राम स्वराज विषय पर  मेघनाथ जी से हुई बातचीत 

ग्राम स्वराज आज भी महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि विकेन्द्रीकरण हमें इन्सानियत का रास्ता दिखाती है जो केन्द्रीकरण फांसीवाद का। एफडीआई या वालमार्ट क्या है? केन्द्रीय कंपनी केन्द्रीय फायदे के लिए। गांव से आने वाला उत्पाद सबके लिए लाभप्रद होता है। उदाहरण के तौर पर अमूल को लिया जा सकता है जो सहकारिता के माध्यम से विकेन्द्रीकरण से केन्द्रीकरण तक आता है। केन्द्रीकरण की ताकत भी भ्रष्टाचार का कारण है। इसमें बीच में मिलने वाले हिस्से की वजह से विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। पंचायती राज की बात करें तो आज तक सरकार पेसा पंचायत एक्सटेंसन टू सिडयूल ऐरिया एक्ट को लाने के लिए तैयार नहीं है। पंचायत को अधिकारों से वंचित रखा गया है। झारखंड जैसे नये राज्यों में भी पंचायत के हाथ बंधे हुए ही है। अगर इनके पास निर्णय लेने का अधिकार हो तो यह गांव आर्थिक के साथ ही विचार की दृष्टि से भी ऊपर उठ सकते हैं। इसके अभाव में यह सिर्फ गुलाम बन कर रह जाएंगे। 

शिक्षा आज मशीनीकृत और केन्द्रीकृत हो कर रह गई है। अगर हम इतिहास की बात करें तो वह भी हमें केन्द्र के अनुसार ही बताए जाते हैं। विकेन्द्रकरण होने पर हर छोटी-बड़ी जगह और व्यक्ति का इतिहास हमारे सामने होता है। तक हम गांव, जिला, राज्य और देश सभी का इतिहास जान पाते हैं। सिर्फ गिने चुने नाम या जगहों के नहीं। उसी तरह भूगोल में भी हम देश-विदेश के नदियों के नाम तो जान लेते हैं। लेकिन अपने गांव के पास में बहने वाली नदी का नाम नहीं जान पाते हैं। केन्द्रीकरण के कारण किसान का उगाया अनाज तो खाते हैं लेकिन खेती-बाड़ी के बारे में जानने की इच्छा नहीं रखते हैं। चीन ने तो एलोपैथिक दवाओं को बढ़ावा दिया। जबकि हम आयुर्वेद को भूलाते जा रहे हैं। अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर होने लगे हैं। 
योजनाएं गांवों के लिए बनाई तो जाति है लेकिन एसी बंद कमरों में गांव की पृष्ठभूमि को कैसे समझा जा सकता है। खेती की योजना जिले स्तर पर भी भिन्न- भिन्न हो सकती है। तरीका क्या होगा यह बात अहम है। केन्द्रीयकरण को बिल्कुल से नकार देना भी सही नहीं है क्योंकि जातिवाद और खाप पंचायत जैसी समस्या गांव में ही पाई जाती है। ऐसी रूढ़ीवादिता के खात्मे की जरूरत है। 
अंबेडकर जी ने केन्द्रीय ढांचे में कुछ बातों पर ध्यान नहीं दिया फिर भी वह सही है। ग्राम स्वराज में कुछ समस्याएं तो है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। लेकिन सामाजिक आंदोलन से तोड़ा जा सकता है। जैसे सती प्रथा को उठाना केन्द्रीय आंदोलन था। विकेन्द्रीयकरण में करूतियों को हटाना आवश्यक है। जिसमें केन्द्रीय समाजिक आंदोलन से बदलाव लाया जा सकता है। 
हाल ही में नया जंगल कानून आया है। जिसमें क्षेत्र में लोगों को बसाने की बात की गई है। जबकि इस समस्या का समाधान पंचायत स्तर पर भी किया जा सकता था। आज हमारे नेता, प्रतिनिधि इन्सान से रिश्ता रख ही नहीं पाता है। वह सिर्फ स्वार्थ और सत्ता में निहित हो जाता है। गांव के बीच केन्द्र में गया व्यक्ति भी गांव के बारे में नहीं सोच पाता है। इससे बड़ी बिडम्बना और क्या हो सकती है। आज सत्ता और जनता के बीत की दूरी बढ़ती जा रही है। दिल्ली में बैठा व्यक्ति जो सिर्फ बस्तर के बारे में सुना हो वह उसके बारे में क्या जान सकता है और निर्णय ले सकता है कि वहां क्या होना चाहिए क्या नहीं। विधानसभा में बैठ कर गांव के विकास की बाते तो हो सकती है लेकिन वास्तविकता में ग्रामीण विकास के लिए विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। गावं का मुखिया अपने गांव के लोगों से ऐसा रिश्ता रखता है जो केन्द्र में शासित सरकार का नहीं हो सकता। गांव की पंचायत का फैसला करने वाला उनके गीच का होता है। आस-पास के 5-10 किलोमीटर तक के लोग होते हैं। उनका एक रिश्ता होता है। वह अपने शासक को देख सकते हैं, जानते हैं। ताकत और दूरी किसी भी रिश्ते को मजबूत करती है। यही साकारात्मक निर्णय का कारण भी बनता है। 

शनिवार, 22 सितंबर 2012

स्वस्थ्य गाँव बनाने का संकल्प

शहरों में अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा तो मिल जाती है लेकिन गांव की अस्वस्थ्यता पर भी किसी की नजर चली ही गई। हरियाणा के सोनीपत जिले में दो गांव हरसाना और राठधना को पूर्णतः स्वस्थ्य बनाने के लिए हाल ही में एक साल के पाइलट प्रोजेक्ट को अस्तित्व में लाया गया है। इस प्रोजेक्ट की कामयाबी के बाद धीरे-धीरे प्रत्येक जिले के एक-एक गांव को इस योजना में शामिल किया जाएगा। इसका जिम्मा आयुष विभाग ने लिया है। विभाग के सदस्य सबसे पहले दोनों गांव के हर एक घर में जाकर दौरा करने के साथ ग्रामीणों को स्वस्थ्य रहने के तरीके बताएंगे। आयुष विभाग की उपनिदेशक डा. संगीता नेहरा के नेतृत्व में प्रोजेक्ट को अंजाम दिया जाएगा इसका कारण है वह पिछले छह सालों से उनके लिए कार्य कर रही है। डा. विनय चैधरी राठधना में योजना की कामयाबी के लिए सहायता कर रहे हैं। उनका लक्ष्य गांव का हर घर स्वस्थ्य करना है जिसके पूरे होते ही प्रोजेक्ट अपने आप ही पूरा हो जाएगा। 
खास बात यह है कि योग साधना और घर में ही मौजूद वस्तुओं के इस्तेमाल से ही गांव को स्वस्थ्य बनाने के नायाब तरीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। गांव में जाकर आयुष विभाग के चिकित्सक ग्रामीणों को दवाओं  की जगह ध्यान के माध्यम से स्वस्थ्य रहने के बारे में बताएंगे। प्रोजेक्ट के तहत ग्रामीणों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के साथ ही विभाग के टीम दोनों गांव में घर-घर जाकर लोगों बातचीत करके उनकी समस्याओं को समझेंगे।  हर सप्ताह का शनिवार दिन दौरे के लिए सुनिश्चत किया गया है। डाक्टर गांव के स्कूलों में बच्चों को स्वास्थ्य के प्रति सजग करेगें। औषधीय पौधों और उपयोगी मसालों के बारे में गांव में प्रदर्शनी आयोजित होगी।
दूसरी बात यह कि हमारी रसोई में उपस्थित रोजमर्रा की चीजों काली मिर्च, जीरा, अजवायन, तुलसी, हल्दी, मेथी आदि के उपयोग से भी कई बीमारियों से कैसे बचा जा सकता है इसकी जानकारी दी जाएगी। कैसे यह प्राकृतिक प्रतिरोधक का काम करते है इसके महत्व को समझाने की जरूरत है। हर घर में साधारण तौर पर उपलब्ध होने वाले 5 औषधीय पौधे जैसे अश्वगंधा, तुलसी, गिलोए, लेमन ग्रास लगवाया जाएगा।
आयुष विभाग की उपनिदेशका डा. संगीता नेहरा का कहना है कि सिर्फ पानी की मात्रा कितनी होनी चाहिए। पानी पीने का अगर हमारा तरीका ठीक हो तो हम बहुत सारी बीमारियों से बच सकते हैं। हमारे शरीर में प्रारंभ से ही आत्म चिकित्सा शक्ति होती हैं। इस शक्ति को योग व ध्यान के द्वारा और बढ़ाया जा सकता है, जो हमें सामान्यतः रोगों से दूर रख सकता है। हमें अपनी दिनचर्या पर ध्यान देना चाहिए। जैसा कि अकसर किया जाता है सुबह उठते ही चाय पीते हैं, जो स्वास्थ्य के बिल्कुल सही नहीं है। इसलिए पूरे परिवार की दिनचर्या का सही होना जरूरी है। हमारा ठीक ढंग से आहार लेना हमारे लिए अमृत का काम करता है। वही उनकी सहयोगी रीता कहती है कि योग और ध्यान से बहुत सी बीमारियों से दूर रहा जा सकता है। यही कारण है कि गांव में इसका प्रशिक्षण दिया जाना उचित है। हम इनके द्वारा अपने ही अंदर व्याप्त शक्तियों को रोग से लड़ने के लिए अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
तीसरी बात मनुष्य की स्वस्थ्यता सिर्फ शारीरिक रूप से ही आवश्यक नहीं है अपितु  मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहना जरूरी है। शारीरिक, मानसिक व आत्मिक रूप से स्वस्थ होने पर ही किसी को पूर्ण रूप से स्वस्थ्य कहा जा सकता है। इसके लिए गांवों में प्रत्येक शनिवार को योग व ध्यान का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाएगा। भारतीय आयुर्वेदिक पद्धति के अनुसार योग व ध्यान द्वारा मनुष्य बिना दवाईयों के पूर्ण तौर पर स्वस्थ्य रह सकता है। हमारे हर एक सेल को आक्सिजन की जरूरत है जिसके लिए प्राणायाम काफी उपयोगी है। इन सबके अलावा यदि बीमारी गंभीर है तो उन्हें चिकित्सालय में इलाज के लिए भेजा जाएगा। लेकिन 80 प्रतिशत सामान्य बीमारियां ही होती है जो आगे जा कर बढ़ जाती है। अतएव शुरूआती इलाज ज्यादा महत्वपूर्ण है। उदाहरण स्वरूप एक महिला को आठ साल से नजले की बीमारी थी जो प्रणायाम द्वारा पूरी तरह बिना किसी दवा के ठीक हुई। 
जैसा की आकड़े बताते हैं कि  हरियाण में लड़कियों की संख्या कम है जिसे ध्यान में रखते हुए कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का प्रयास करेंगे। इसके लिए सोच में बदलाव लाना जरूरी है। इसके लिए प्राथमिक तौर पर शिक्षित करना होगा। लिटिल एंजल स्कूल के निदेशक आशिश आर्य भी प्रोजेक्ट के काम में लगे हुए है साथ ही माॅडल टाउन में   मानसिक रूप से अस्वस्थ्य बच्चों के लिए स्कूल भी खोला है जिसमें फिलहाल 60-70 बच्चे हैं। इनका कहना है कि गांव की पूर्ण स्वस्थ्यता इनका भी सपना है। आज के समय में डाक्टर भी ग्रामीण इलाकों में काम करने के लिए नहीं आना चाहते हैं। इसीलिए गांव में ऐसे प्रोजेक्ट की आवश्यकता है।  



सुषमासिंह

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

भ्रष्टाचार मिटाने की पहल


संस्थाओं के लिए दिए गए सरकारी फंड का 40 प्रतिशत उनके तंत्र के लोग ही रखते हैं बाकि 60 प्रतिशत ही संस्था तक पहुँच पाता है|


लगभग दस साल पहले प्रारंभ हुई गैर सरकारी संस्था ‘नवजीवन’ सामाजिक, न्यायिक और स्वास्थ्य जैसे तीन क्षेत्रों में काम कर रही  है। सामाजिक कार्य के तौर पर लोगों को जागरूक करना, जिससे समाज में फैल रही परेशानियों का हल निकाला जा सके। स्वास्थ्य शिवरों का अयोजन, झुग्गी-झोपड़ी के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आहार में न्यूट्रिसन देना और जरूरत मंदो को न्याय दिलाने की अनूठी मुहिम, यहां जारी है। इनके सदस्यों की संख्या 162 हैं। संस्थापक शशिकांत पांडा का कहना है कि वह देश से भ्रष्टाचार को मिटाना चाहते हैं। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा नीचले या मध्य वर्ग को ही भुगतना पड़ता है। इस कारण उनका जोर न्यायिक व्यवस्था की ओर ज्यादा है, यहां लोक या जन शिकायत को लिया जाता है। जिसके लिए देश में तो मदद के लिए प्रधानमंत्री से लेकर जिलाधिकारी तक सभी ने इनकी सराहना की हैं। विदेशों में भी 176 देशों से मानवाधिकार मुद्दे पर साथ मिलकर काम हो रहा है।
संस्था का मानना है कि गरीब और बेसहारों की सेवा करना भगवान की सेवा करने जैसा  है। संस्था की योजना है कि आने वाले समय में भारत के हर एक गांव में इनके स्वयं सेवक मदद के लिए उपस्थित होंगे। इन्होंने हिमाचल, बिहार, झारखंड, राजस्थान, उडि़सा, बंगाल, मुम्बई, यूपी में समाज और न्यान को लेकर काफी लोगों की मदद की है। अब इनका रूख दक्षिण भारत की ओर हो रहा है। वर्तमान समय में एनजीओ पैसा कमाने का धंधा बनता जा रहा है ऐसे में पैसा उनके हाथों में जाता है जिन्हें कमाने की धुन है न की वास्तव में काम करने वालों के पास। 
शिक्षा के लिए इनका विद्यालय मदनपुर खादन में खोला गया है जिसमें श्री राम शिक्षा पीठ के साथ मिलकर लगभग 200 अनाथ, निसहाय, गरीब बच्चों को शिक्षित किया जाता है। संस्था की यूएनओ में सदस्यता की चाहत वास्तविक हालात को समझने और सही रूप में काम कर पाने के लिए है। क्योंकि सिर्फ कह देना कि एनजीओ के पास विदेशी रुपया आ रहा है काफी नहीं है। क्या, कितना, कैसे, किसके लिए और कब आ रहा है इसकी जानकारी होना भी आवश्यक है। आर्थिक आभाव में समाज सेवा करना थोड़ा मुष्किल हो जाता है। फिर भी इस संस्था को आ रही कोई भी सहायता सीधे जरूरतमंद तक पंहुचाया जाता है। 
संस्था ने दिल्ली समाज कल्याण विभाग के बारे में साफ कहा है कि संस्थाओं के लिए दिए गए सरकारी फंड का 40 प्रतिशत उनके तंत्र के लोग ही रखते हैं बाकि 60 प्रतिशत ही संस्था तक पहुँचता है। इन्होंने पौश्टिक आहार, प्रदूषण, जल, मिट्टी, पोलियों और एड्स जागरूकता आंदोलन, कृषि, प्राकृतिक आपदा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर देश भर में काम किया है। इसके बाद भविष्य में इनकी बाल अनाथालय निर्माण की योजना है। नेक काम में जिस तरह अड़चने आती है इनके साथ भी आई। सरकार को पूछे गए सवालों का जवाब न मिलना या मदद के नाम पर केवल आश्वासन देना। आर्थिक संकट में भी संस्था को काम के साथ जीवित रखना। अन्य एनजीओ से तालमेल के बारे में इनका मानना है कि वैश्विक तौर पर काम करना ज्यादा उचित है। भारत को भ्रष्ट मुक्त करके ही सबका कल्याण हो सकता है। सिर्फ लोग अपना-अपना काम ही ईमानदारी से करने लगे तो काफी समस्याओं का निवारण हो जाएगा। 
इन सब के बावजूद एक बात साफ है कि इतने व्यापक क्षेत्र को अपनी संस्था में शामिल करने का खामियाजा सामने आने लगा है। संस्था के लगन में कोई कमी नहीं है लेकिन सबसे अलग बात यह है कि हर तरह के रुपयों के लेन-देन, काम आदि का पूरा व्योरा इनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है जो कि बहुत कम संस्थाएं ही करती है। संस्था की व्यापकता के कारण सभी क्षेत्रों में बराबर ध्यान नहीं दिया जा सकता। फिर भी मुख्य मुद्दा समाज के कल्याण का है तो मुसिबत जिस क्षेत्र में होगी वहीं काम करना प्राथमिकता है। आज छोटे से दफ्तर में काम करते हुए भी व्यापक सोच रखने का जज्बे की जरूरत अन्य संस्थाओं को भी है। 

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

मनवाधिकार हर जाति का हक़ है

वर्ण और जाति व्यवस्था की नीव तो सैकड़ो सालो पहले ही पड़ गई थी जिसका भुगतान आज उनकी पीढ़ी कमजोर, दलित लोगों को करना पड़ रहा है। जाति व्यवस्था के नाम पर लोग अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए है। आजादी के बाद की स्थिति और भी दयनीय होती जा रही है। जाति प्रथा के खिलाफ मानव अधिकार के लिए संघर्ष जारि रखते हुए  वाराणसी में डा. लेनिनि रघुवंशी और उनकी पत्नी श्रुती ने मिलकर 1996 में पीवीसीएचआर मानव अधिकार जननिग्रनी समीति और तीन साल बाद जन मित्र न्यास संस्था स्थापित किया। यहां महिलाओं, बच्चों, दलितों और आदिवासियों के लिए काम किया जाता है। इन कमजोर वर्ग को कानूनी तौर पर न्याय दिलाना और समाज में आगे लाना उनके अधिकारों का हनन होने से बचाना इनका मुख्य मकसद है। पीवीसीएचआर द्वारा एक स्कूल भी चलाया जाता है भगवानंला नाम से। भारत में लगभग 160 मिलियन लोग दलितों की श्रेणी में आते हैं।
संस्था द्वारा बुनकरों की हालत में सुधार लाने के लिए भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाते हैं। लेनिन के सफल कार्यों के लिए इन्हें विभिन्न अवार्डो से नवाजा गया है। 2010 में जर्मनी द्वारा अतंरराष्ट्रीय मानव अधिकार अवार्ड दिया गया। इनका कहना है कि समस्या हमारे पास ही है तो समाधान भी हमें ही करना होगा। इन सबके लिए जरूरी है इनका शिक्षित होना। जब तक यह अपने अधिकारों के बारे में जानेंगे ही नहीं तब तक आगे बढ़ने की कोशिश भी नहीं कर पाऐंगे। एक उच्च और सक्रिय नेटवर्क के माध्यम से इन पीडि़तों को मदद करने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। ताकि इनको अछुत न समझा जाए। बुनकरों, बंधुआ मजदरों आदि का शोषण न हो, इनको न्याय दिया जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं पर इन्हें भी हक मिलना चाहिए।
केवल सरकार द्वारा आरक्षण देने से ही भला नहीं हो सकता क्योंकि इसका लाभ भी कुछ पहुंची हुई जातिया ही उठा पाती है उनका क्या जो आज भी समानता की नजर से दूर है। उत्तर भारत सबसे बुरी स्थिति में रह रहे मुसहर जनजाति की बात करें तो उन्हें अछुत ही माना जाता है। जबकि भरतीय कानून के अनुसार अछुत कहना भी अपराध है। लगभग 5-7 लाख मुसहर सिर्फ उत्तर प्रदेश में हैं। जिसपर लेनिन ने रिसर्च किया है। सोनभद्र क्षेत्र में 12वीं सदी से रहने वाले घसिया आदिवासियों को पलायन करने पर सरकार और उद्योगपतियों ने मजबूर कर दिया। उसी समुदाय की एक 70 साल की बुजुर्ग सोमरी देवी कहती है कि दनके पूवर्ज वही रहते थे। सावा कोदो की खेती करते थे। लेकिन हमें हमारे ही स्थान से भगा दिया गया। आज दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती है। किसी प्रकार की कोई सरकारी या गैर सरकारी सहायता हमें नहीं प्राप्त है। सिंगरौली से पलायित हुए आदिवासियों की दशा भी ऐसी ही है। उत्तर प्रदेश में अपने ही अधिकारों से अछुते आदिवासी जाति करवार, गोंड, चेरों, कोल, भुइया, बैगा, धारखार, पनिका, पत्थरी, परहिया, घसिया, अगरिया आदि को खाने का निवाला जुटाना ही मुश्किल हो जाता है कितनी ही मौते कुपोषण और शोषण के कारण हो जाती है। फिर वह आरक्षण जैसे मुद्दे को कैसे समझ सकते हैं। इस संस्था और दूसरे एनजीओ की मदद से इन्हें वह सारी सुविधाएं देने का प्रयास किया जा रहा है जिससे इनके बच्चे पढ़े, इनकी संस्कृति को बचाया जा सके। करमा नृत्य महोत्सव को फिर से शुरू किया गया।
राज्य और केन्द्र दोनों सरकारे इन जातियों को पलायन करने पर मजबूर तो करती है लेकिन यह भूल जाती है कि अब इनका क्या होगा। इनकी पारंपरिक विरासत छिनने के बाद इनको अधिकार का क्या? इस बाबत जब संस्था ने काम करना शुरू किया तो बहुत सी पुलिसिया और सरकारी अड़चने सामने आई। लोगों ने लेनिन और उनके साथियों के खिलाफ लोगों को भड़काने का आरोप भी लगाया। फिर भी एक संस्कृति को बचाने की कोशिश जारि रहीं और आगे भी इनके हक के लिए लड़ाई चलती रहेगी। मुद्दा मानव जाति का है तो सचेत होना भी आवश्यक है।

सुषमा सिंह, वाराणसी

गुरुवार, 14 जून 2012

अनाज: न खाया जाए, न रखा जाए ?

कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती-किसानी पर ही निर्भर रहती है। भारत की इससे दयनीय स्थिति और क्या हो सकती है कि एक तरफ गरीबों के खाने के लिए  अनाज नहीं है तो दूसरी तरफ लाखों टन अनाज सरकार की ढीलाई और गोदामों में हो रही लापरवाही की वजह से खराब हो जा रहे हैं। इतना अनाज बर्बाद हो रहा है जितना अगर गरीबों में बांट दिया जा, तो वो सालों खा सकते हैं। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) भारत सरकार की खाद्य भंडारण ईकाई है जो 14 जनवरी 1965 को कार्पोरेशन एक्ट1964 के तहत अनाज कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती-किसानी पर ही निर्भर रहती है। भारत की इससे दयनीय स्थिति और क्या हो सकती है कि एक तरफ गरीबों के खाने के लिए अनाज नहीं है तो दूसरी तरफ लाखों टन अनाज सरकार की ढीलाई और गोदामों में हो रही लापरवाही की वजह से खराब हो जा रहे हैं। इतना अनाज बर्बाद हो रहा है जितना अगर गरीबों में बांट दिया जाए तो वो सालों खा सकते हैं। भारतीय खाद्य निगम (एफफसीआई) भारत सरकार की खाद्य भण्डारण ईकाई है जो 14 जनवरी 1965 को कार्पोरेशन एक्ट 1964 के तहत अनाज भण्डारण, देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद्यान्नों का भण्डारण, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों के लिए  प्रभावी समर्थन मूल्य की व्यवस्था करने के लिए  स्थापित की गई। मुख्यालय नई दिल्ली और पांच वर्षीय कार्यालय है। सरकार इसमें हर साल कुल उत्पादन का करीब 15 से 20 प्रतिशत गेंहू और कुल चावल उत्पादन का 12 से 15 प्रतिशत खरीदती है। एफफसीआई अखिल भारतीय स्तर पर डिपुओं के जरिये खाद्यान्न भण्डारण  करता है। इसमें क्रेप भण्डारण भी शामिल है। डनेज का प्रयोग  और पोलीथीन कवर आदि के जरिये  खुले में भण्डारण  किया जाता है। अखिल भारतीय स्तर पर करीब 1451 गोदाम है। केन्द्र सरकार भारतीय खाद्य निगम और राज्य एजेंसियों  के जरिये धान मोटे अनाजों और गेंहू को समर्थन मूल्य पर खरीदा करती है। इसके अलावा उत्पादकों के पास यह भी विकल्प होता है कि वे राज्य के किसी भी  एजेंसियों और खुले बाजार में जहां भी चाहे अनाज को बेच सकते हैं।

देश के कई राज्यों में अनाज भण्डारण  का बुरा हाल है। बिहार में वर्तमान हालत यह है पिछले साल 31 जुलाई 2011, केंद्रीय पूल के लिए  राज्य की चार एजेंसियों  के माध्यम से खरीदा गया 83 हजार टन गेहूं  31 मार्च 2012 तक एफफसीआइ के  गोदामों में पहुंचा ही नहीं, न ही उसका कोई हिसाब-किताब है। बिहार सरकार से गुम हुए गेहूं की तलाश करवा रही है तो एफफसीआई के अफसर पड़ताल में लग  गए है। जबकि यह एफफसीआइ के दस्तावेजों में यह दर्ज है।

बीकानेर मंडी की स्थिति यह है कि वहां लगभग दो लाख बारदाने की जरूरत है। मंडी परिसर में दो दिन की खरीद के बाद भी 75 हजार क्विंटल गेहूं  खरीद के लिए  बचे रहे। किसानों की आशाओं पर बारीस ने पहले भी तीन बार पानी फेर दिया है। सरकार ने खाजूवाला मंडी को एक लाख 15 हजार बारदाना व बीकानेर मंडी को केवल 50 हजार बारदाना उपलब्ध करवाया। यह किस आधार पर किया गया इसका कोई जवाब नहीं है। भामाशाह मंडी में बेमौसम बारिश व अव्यवस्थाओं के चलते भीगने से काफी गेहूं  खराब हो गया हैं। खराब गेहूं  की तुलाई तो हुई नहीं जिसका खामियाजा किसानों को करीब 30 लाख रुपये के नुकसान के रूप में उठाना पड़ा, इसकी भरपाई के लिए किसी के पास कोई विकल्प नहीं है। एफफसीआई ने ऐसे  गेहूं को साफ तौर पर लेने से मना कर दिया। अब किसान भी क्या करें। बूंदी जिले के रोटेदा गोराम मंदी में  सोलह दिन बाद गेहूं की तुलाई हुई। एफफसीआई ने करीब 12 बोरी भीगा हुआ गेहूं  जिसमें ढेले बंध गए थे, बैरन लौटा दिया। 26 मई नरसिंहगढ़ तहसील के गोराम मंडावर में स्थित खरीदी केंद्र पर दो परिधि  में गेहूं तुलाई के विवाद पर एक  युवक की गोली लगने से मौत भी हो गई।

अमृतसर, पंजाब के कई इलाकों में गेहूं  और चावल पिछले सालों से पड़े-पड़े सड़ चुके हैं, उन गाँव में अब बीमारियों का खतरा मडराने लगा है। इतना ही नहीं इन सड़े हुए अनाज को न हटाने के कारण से गोदामों में भी भण्डारण  की समस्या उत्पन्न हो गई है। मानसून के शुरू होते ही यहां 232 लाख टन गेहूं  आ जायेंगे जिसके रखने के लि, जगह नहीं बची है। नेशनल हाइवे के पास ही लगे  इस सरकारी गोदाम में चावल की बोरियों के कई कई फीट ऊंचे ढेर लगे  हुए  हैं जो अब किसी काम में नहीं आ सकते हैं।

मध्यप्रदेश के गेहूं  खरीद केंद्रों पर इस सीजन में गेहूं  समर्थन मूल्य तथा उस पर राज्य सरकार का बोनस देकर खरीदा गया। खरीदे गए  गेहूं  में से लगभग 90 प्रतिशत का सुरक्षित भण्डारण  भी राज्य सरकार कर चुकी है। सरकार ने किसानों से समर्थन मूल्य पर जो गेहूं  खरीदा उसका मूल्य 9,572 करोड़ रुपये  है। राज्य सरकार ने उसकी गेहूं फसल की खरीदी के लिए व्यापक इंतजाम किये हैं।

वही उ-प्र- में गेहूं क्रय केन्द्रों पर मनमानी की हद हो गई। बिचैलिये जमकर मुनाफा कमाने में जुटे हैं। एक  किसान के नाम से कई चेक जारी किये गए  हैं। बोरियों को कमी से भण्डारण खुले में किया जा रहा है। जहां प्रभारी का स्थानांतर हो गया, वहां क्रय केन्द्र को ही बंद कर दिया गया है। गेहूं  क्रय केन्द्रों से लगातार आ रहीं शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए  उन्नाव के कई गेहूं  क्रय केंद्रों पर आकस्मिक छापा मारा गया । निरिक्षण  में बड़े पैमाने पर खामियां तो मिलीं और फतेहपुर में मंडी के जाने पर कर्मचारी व अधिकारी ताला डालकर भाग  गए।

एफफसीआई की अनाज भण्डारण  प्रणाली की खामियों के बारे में जब अदालत और सामाजिक संगठनो द्वारा आपत्तियां दर्ज की जाती हैं तो वह गोदामों की कमी का रोना रोते हुए अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन सच्चाई वह नहीं है जो दिखाई जा रही है, उसके कई गोदामों में अनाज की जगह शराब का भण्डारण  किया जा रहा है, क्योंकि वह जगह किसी और को किराये पर दे रखी है। एफसीआई में भ्रष्टाचार का आलम छाया हुआ है और दूसरी ओर केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा  विधेयक लाने की तैयारी में है। इसके अलावा कीमतों को नियंत्रित करने के लिए खुला बाजार बिक्री योजना (ओ एम् एस एस ) के जरिये  बाजार में गेहूं  की बिक्री करती है। गेहूं  और चावल का  देशों को निर्यात भी एफसीआई के भंडारों से ही होता है। मोटे अनाजों की बिक्री खुले बाजार में निविदा के जरिये होती है। यहां भी जमकर धांधली होती है। ऐसे  में सिर्फ गरीब को दोष देना कहां तक सही है। पारंपरिक  तौर पर जिस तरह अनाजों का भण्डारण घर  के भीतर ही किया जाता था क्या उस उपाय को यहां लागू नहीं किया जा सकता है। अनाज को सड़ाने की जगह भूख मिटाने के लिए नहीं इस्तेमाल किया जा सकता है। एफसीआई के मुताबिक अगले महीने की शुरुआत में सिर्फ पंजाब, हरियाणा और मध्यप्रदेश में उसके पास 476 लाख टन अनाज आ चुका होगा। इसमें से 232 लाख टन गेहूं रखने के लिए  जगह नहीं है।

एफसीआई के गोदामों में अनाज भण्डारण  की पर्याप्त क्षमता होने के बावजूद भी काफी मंडी में अनाज यहां-वहां सड़ जा रहे हैं । कारण  साफ है जिसके बीच सरकार खुद आने से बचती है। बिचैलियों के माध्यम से प्राइवेट गोदाम और वेयर हाउस किरा, पर ले रहे हैं । जिसके लिए  अफसरों को जबरजस्त कमीशन भी मिलता है। फिर क्या होना है सड़ा हुआ अनाज कौडि़यों के मोल शराब उत्पादकों को बेच दिया जाता है वहां से भी अच्छी आमदनी हो जाती है। कुछ साल पहले विशेष जरूरत पड़ने पर 1 रुपये 20 पैसे प्रति स्क्वायर फीट की दर से प्राइवेट गोदाम किराये  पर लिए  जाते थे, वहीं अब सेंट्रल वेयर हाउसिंग कारपोरेशन और स्टेट वेयर हाउसिंग कारपोरेशन के जरिये 3 रुपये प्रति स्क्वायर फीट की दर से गोदाम किराये पर लिए जा रहे हैं। सोचने वाली बात यह है कि एफसीआई अपने गोदाम दूसरों को किराये पर दे रहा है जबकि उसमें आये अनाजों का भण्डारण  बाहर करना पड़ रहा है। अगर भारत सरकार ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सुझाव पर अमल किया तो अगले कुछ महीनों बाद 72 प्रतिशत जनता को 3 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गेहूं और 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से चावल मिल सकता है लेकिन यह बात हकीकत हो इसकी कोई गारंटी नहीं है। पिछले कुछ सालों में खपत की तुलना में भारी स्टाक जमा होने के कारण भी अब गोदामों में जगह नहीं बची रही है। कोल्ड स्टोरेज का अभाव, गोदामों का दूसरे कामों में उपयोग और उचित प्रबंधन न होने से भी अनाज सड़ रहा है। जबकि सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी से अनाज का भण्डारण  करने की बात कह रही  है। कोल्ड स्टोरेज के संबंध में उसने एक योजना विजन-2015 तैयार की है, जिसके तहत गोदामों में अनाज के संरक्षण की जिम्मेदारी इंडियन ग्रेन स्टोरेज मैनेजमेंट और रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईजीएमआरआई) को सौंपी गई है। एजेंसियों का कहना है कि एफसीआई गेहूं  का भुगतान करने में काफी विलंब करती रही है, ऐसे में उनके पास गेहूं खरीद के बजट का एक  बड़ा हिस्सा फंस गया है और वे काश्तकारों का भी पेमेंट नहीं कर पा रही हैं। आरएफसी को छोड़कर बाकी सभी सरकारी एजेंसियों  को शुरूआत में ही क्षेत्रीय कार्यालय स्तर से बजट जारी किया जाता है। उसी समय वे काश्तकारों का  गेहूं खरीदती हैं। इसके बाद किसानों से खरीदे गए  गेहूं  की एफसीआई को डिलीवरी देने के बाद भुगतान एजेंसियों के पास पहुंच जाता है। यह चक्र चलता रहे, तो एजेंसियों  के पास बजट बरकरार रहता है। जबकि एफसीआई के पास एजेंसियों ने जो गेहूं  भेजा है, उसका करीब 50 फीसदी भुगतान अभी तक नहीं हो सका है, जिसकी कीमत करीब ढाई करोड़ हैं। गेहूं  का पेमेंट न मिलने से इनके सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है। अगले 18 महीने में खाद्यान्न के भण्डारण  की समस्या का आंशिक समाधान होने की संभावना है जताई जा रही है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र  के भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने 10 वर्षीय गारंटी योजना के तहत 80 लाख टन क्षमता के नए  गोदामों के निर्माण  कार्य को पास कर दिया है। एफसीआई के पास इस समय 130 लाख टन अनाज भण्डारण  की क्षमता है जबकि उसने 150 लाख टन से ज्यादा क्षमता वाले गोदाम सरकार और निजी एजेंसियों  से किराये पर ले रखे हैं। इसके पास ढंके हुए और खंभे वाले गोदाम हैं और इसकी क्षमता 26 .2 लाख टन है जबकि 5-5 लाख टन भण्डारण  क्षमता विभिन्न निजी कंपनियों से किराये पर ली गई है। बजट 2012-13 में वित्त मंत्री  ने भण्डारण  की नई क्षमता के निर्माण की खातिर 5000 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्ताव रखा है। पिछले साल के बजट में इस मद में 2000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए थे। पिछले ,क साल में सरकार ने 20 लाख टन भण्डारण की अतिरिक्त क्षमता को मंजूरी दी है, जिसके जल्द पूरा होने की संभावना है। देश में लाजिस्टिक की लागत जीडीपी का करीब 14 फीसदी है। लिहाजा पीपीपी माडल को प्रोत्साहित किया जाने की सलाह गलत नहीं है। ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास कोष  के तहत गोदामों के निर्माण पर और अधिक व्यय में भारी बढ़ोतरी सही समय पर उठाया गया उचित कदम है। ऐसे में सरकार का जोर ब्याज की लागत घटने पर हो तो ज्यादा बेहतर काम हो सकता है। और ऐसा तभी संभव हो सकता है जब निवेशकों को आरआईडीएफ को कोष का वितरण सीधे तौर पर नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) द्वारा किया जाए। इससे बैंकों की मध्यस्थता लागत को खत्म किया जा सकता है।









बुधवार, 23 मई 2012

रंगमंच में "थिएटर आँफ रेलेवेंस"

रंगमंच को नया रूप देने की प्रयास की गाथा को संपादक संजीव निगम ने मंजुल भरद्वाज के "थिएटर आँफ रेलेवेंस" किताब के जरिये दुनिया के सामने लाया है | इस किताब में रंगमंच की पेचीदगी को सुलझाने के लिए कलाकार मंजुल से किये गए सवाल जवाब तो पढ़ने को मिलेंगे ही साथ ही थिएटर की इस नयी परिभाषा को व्यापक तौर से समझने का मौका भी | भारत जैसी पृष्ठभूमि में आज नाटकों की दशा बहुत अच्छी नहीं है | रंगमंच के परिवेश और दर्शकों के मन को भापते हुए जिस थिएटर का अनुकरण हुआ, उसी सोच को अब पाठकों तक पहुँचाने की मुहिम इस किताब में दिख रही है | मरती हुई प्रतिभा को जगाने के साथ ही 50 ,000 बच्चो को स्कूल की रह इस थिएटर ने दिखाई | किताब की शुरुआत तो काफी पहले ही हो गई थी लेकिन इसके आने में समय लगा | 90 के दशक से प्रारंभ इस अभियान की मर्म कहानी भी यहाँ जानने को मिलेगी किस प्रकार थिएटर आँफ रेलेवेंस की स्थापना हुई और आज किस मुकाम तक जा चुकी है | यह सच है की नाटक हमारे देश काल वातावरण के अनुसार हो तो उसका प्रभाव आम जनता पर ज्यादा होगा | इसके लिए देश में ऐसी प्रतिभावों को तलाश कर उन्हें सामने लाना चाहिये | जो नाट्यकला को सिर्फ जीवित ही न रखे अपितु उसे महान कला बनाये | इसी प्रयास के तौर पर आई इस किताब में थिएटर का नया रंग किस तरह से सबसे अलग है यह पढ़ कर ही निर्णय किया जा सकता है |

सुषमा सिंह

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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

एनजीओ समाज का अहम हिस्सा है

MR. SANTANU MISHRA

आई एम कलाम डाक्युमेंट्री बनाने वाली स्माइल फाउंडेसन राष्ट्रीय स्तर की 2002 में स्थापित विकास संस्था है। वर्तमान समय में इसकी पहुँच सीधे तौर पर 2 लाख गरीब बच्चों  और युवाओं तक है। देश के 25 राज्यों में 160 कल्याणकारी प्रोजेक्ट चल रहे हैं। पहला मिशन एजुकेशन दूसरा स्टेप तीसरा स्मसइल ऑन व्यील और चौथा स्वाभिमान। इस संस्था के निदेशक सांतनु मिश्रा से सुषमा सिंह की एनजीओ मुद्दे पर आधारित बातचीत का कुछ अंश प्रस्तुत है -

एनजीओ चलाने के पीछे वजह क्या होती है। पैसा या मुद्दा?
एनजीओ को चलाने के लिए कारण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। स्माइल की शुरूआत का भी एक कारण है कमजोर वर्ग को आगे लाने की भावुकता से इस फाउंडेसन की नीव पड़ी। हम समाज को क्या और कैसे दे सकते हैं। इस सोच के साथ ही प्राइमरी स्तर पर बच्चों को शिक्षित कर समाज की जड़ो को मजबूत करने का प्रयास किया गया।  मजबूरी में अपना बचपन खो रहे बच्चों को सही दिशा देना ही स्माइल की कोशिश है। अपने इसी मुद्दे के साथ हम आज भी काम कर रहे हैं। यहां पर बहुत सी समस्याएं है केवल कुछ एनजीओं से इसका समाधान नहीं हो सकता है। 
 
प्राकृतिक आपदाओं के ठीक बाद एनजीओ की संख्या में अचानक इतनी ज्यादा बढ़ोत्तरी के क्या कारण है?
एनजीओ प्राकृतिक आपदाओं में दो प्रकार से काम करती है। एक तो आपदाओं में तुरन्त राहत पहुंचाने का दूसरा उनके पुर्नवास का। आपदाओं के बाद भी लोगों के पुनवार्स का काम होता है, जो दीर्घ कालीन है। ऐसे समय में समाजिक मदद के रूप में एनजीओ एक विकल्प के तौर पर सामने आते हैं। आपदा जितनी बड़ी होती है राहत कार्य की आवश्यकता उतनी ही बढ़ जाती है। कश्मीर में हमने लगातार दो महीने पीड़ितों की मदद की। सुनामी में मछुवारों को उनके रोजमर्रा के सामान देकर उनकी रोजगार में मदद की। संख्या में तेजी की बात है तो डोनर एजेन्सी, सरकार और आम लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। व्यवस्था को मजबूत और पारदर्शी होना होगा। मदद लोगों तक पहुंचनी चाहिए।
 
क्या एनजीओ को मानवाधिकार से जोड़ कर देखा जा सकता है?
मनवाधिकार भी एनजीओ के कार्य का एक हिस्सा है। बच्चों को शिक्षा प्रदान करना भी उनका अधिकार है। उन्हें सिर्फ पकड़ कर पढ़ाने से ज्यादा जरूरी है उनके जीवन में सुधार करना ताकि वह फिर से गलत राह पर न जा सके। एक बच्चा अगर शिक्षित हो कर कामयाबी पाता है तो उसका पूरा परिवार आगे बढ़ता है। स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी इसके अंर्तगत आती है। जैसे यदि किसी रोग का पता पहले लग जाए तो इलाज संभव है और उसका स्वस्थ होना मानवाधिकार है। जानकारी के अभाव में लोगों का जान जा रही है।
 
फंड की जरूरत सभी को होती है। लेकिन क्या इसका कोई दायरा होना चाहिए?
हां फंड का दायरा होना चाहिए और है भी। सरकारी तौर पर पंजीकरण से इसकी शुरूआत हो जाती है। जिसमें कानून के मापदंड पर खरा उतरने के बाद ही मान्यता मिलती है। फंड की जानकारी देने के साथ ही रिर्टन भी फाइल करना होता है। जिसमें तहकीकात होने के साथ करारनामा भी होता है। कार्य क्षमता के हिसाब से फंड दिया जाता है। जैसे यूनीसेफ को 50 हजार करोड़ मिला लेकिन हमारे यहां समस्याएं इतनी है कि सही काम करने पर यह फंड भी कम पड़ जाते हैं। फंड का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार होना चाहिए।
 
एनजीओ के साथ सरकार का तालमेल कैसा है। खास तौर पर कुंडनकुल्लम मामले में?
कुछ संस्थाएं तो सरकार के साथ मिलकर काम करती है। जैसे डब्लूएचओ। अगर सरकार मदद ना करें तो हम कितनी जिम्मेदारी उठा सकते हैं। हम बच्चों को बेसिक शिक्षा देने के बाद उनका सरकारी स्कूलों में दाखिला करवाते हैं। यहां सरकार के खिलाफ जाने का कोई मतलब नहीं है। दोनों को मिल कर काम करने में ही समाज का भला हो सकता है। सरकार हमने ही बनाया है। उन्हें देश के बारे में सोचने का पूरा अधिकार है। वो हमारी रक्षा के लिए अच्छा या बुरा कदम उठा सकती है। अपनी जगह पर सभी सही होते हैं। करीब 20 लाख एनजीओं में से सिर्फ कुछ के बारे में यदि कोई बयान आता है तो कोई कारण होगा। क्या गलत है क्या सही जनता भी जानती है। यह एक लोकतांत्रिक देश है।
 
एनजीओ के कारण बहुत से क्षेत्रों में सुधार भी हुए है और जागरूकता भी आई है। लेकिन क्या अब एनजीओ सिर्फ मुनाफे के लिए लिए खोले जा रहे हैं?
हमारा देश अभी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में हर चीज व्यवस्थित हो जाए यह संभव नहीं है। विकासशील देश में एनजीओ अच्छा काम करते हैं। तो यह सम्मान की बात होती है। एनजीओ खुद में रेगुलेट होना चाहिए। एनजीओ चलाने के साथ ही पूर्ण जानकारी भी होनी चाहिए। जिसके अभाव में आज एनजीओ अपनी दिशा से भटक रहे हैं। पैसों का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हम इसके खिलाफ है। मीडिया का भी बड़ा रोल हो सकता है इस संबंध में। लोगों को जागरूक करने में मदद कर सकती है। समाज के मदद के लिए सभी को आगे आना चाहिए। डोनर का पैसा गरीबों तक पहुंचना चाहिए। उदाहरण के तौर पर पोलियों हमारे देश से खत्म हो चुका है।
 
एक एनजीओ के तौर पर आपका देश के भविष्य के लिए क्या संदेश है?
एनजीओ को अलग से देखने की जरूरत नहीं है। यह समाज के लिए है हमारे समाज का ही एक हिस्सा है। साकारात्मक रूप में सबको साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। पढ़े लिखे लोगों को और अधिक रूचि लेनी चाहिए। सब कुछ छोडत्रकर काम करने की जगह कुछ समय निकाल कर भी समाज के लिए सार्थक काम किया जा सकता है। मानसिकता में भी बदलाव की खास जरूरत है। 

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

रेड लाइट एरिया का सच


सुषमा सिंह/ वाराणसी

गुड़ियां-गुड़ों के खेल के बारे में तो सभी को पता होगा ही। जब वह हमारे लिए बेकार हो जाते हैं या अच्छे नहीं दिखते तो हम दूसरे ले आते हैं या उन्हें बेकार समझ फेक देते हैं। अगर असल जिंदगी के साथ भी ऐसा होने लगे, तो क्या होगा? लेकिन होता है ऐसा भी। वाराणसी में अजीत सिंह इन्सान को इस खेल से सावधान करने की कोशिश का नाम गुड़िया है। 1991 में एक बच्चे को गोद लेने के साथ ही अजीत की लड़ाई समाज में फैली बुराईयों के खिलाफ प्रारंभ हो गई थी लेकिन संस्था के तौर पर गुड़िया का पंजीकरण 1993 में हुआ। यहां  लड़कियों से जुड़ी हर उस समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जाता है जिससे इनकी जिंदगी के दर्द कम हो सके। शिवदासपुर बनारस का वो इलाका है जिसे रेड लाइट क्षेत्र का नाम दिया गया है। इन्हें अपने हितों के लिए लोगों ने 70 के दशक में दाल मंडी से शहर के बाहरी इलाके में भेज दिया गया। यहां सिर्फ औरते ही नहीं इनकी छोटी बच्चियां भी देह व्यापार के काम में लगी हुई थी। इसके लिए उनकी रजामंदी की भी जरूरत नहीं होती है। 300-400 की आबादी वाला यह क्षेत्र अब सुधार की प्रक्रिया में हैं।

 अभी कुछ दिनों पहले ही एक रिपोर्ट आई है भारत में हर घंटे 11 बच्चे गायब हो रहे हैं? ऐसा क्यों हो रहा है? इस मामले में अजीत जी का साफ कहना है कि जब बात बड़े शहरों की होती है तो फलक जैसे लोग सामने आते हैं। छोटे शहरों का क्या जहां रोज कई फलक मिलती है। यू.पी. राज्य काफी अन्य राज्यों से जुड़ा हुआ है इस वजह से बच्चों की तस्करी को आसानी से अंजाम दिया जाता है। अगर वाराणसी की है तो यह बहुसांस्कृतिक शहर है। इस वजह से किसी को सदेंह भी नहीं होता है कि दूसरे क्षेत्र के लोग यहां कर क्या रहे हैं। दूसरा बड़ी ही असानी से बच्चों को यहां से कहीं भी किसी भी मार्ग से पहंुचाया जा सकता है कारण है यातायात की सुविधा। केवल भारत ही नहीं इससे जुड़े बार्डर के अन्य देशों में भी इनकी तस्करी की जाती है। कुछ साल पहले का नीठारी कांड हो या 90 के दशक में बच्चों के अधिक संख्यां में गायब होने की खबर, दक्षिण में शेखों के बच्चियों के साथ निकाह के बाद तलाक की खबर और  मुंबई से गायब बच्चों के बरामद होने की खबरे आती रहती है। आखिर यह बच्चे खोने के बाद मिलते क्यों नहीं? यह भी एक वजह है जिससे हम कह सकते हैं कि खोया हुआ कोई भी बच्चा तस्करी का शिकार हो सकता है। सोचने वाली बात यह भी है कि केवल गरीबों के बच्चों को ही अधिकांश तौर पर निशाना क्यों बनाया जाता है? क्या लड़के लड़कियों में भेद भाव भी एक वजह है जिसका हरजाना अकसर लड़कियों को भरना पड़ता है। बच्चों की तस्करी कई कारणों से की जाती है जैसे बाल श्रम, सेक्स, पलायन, अंग व्यापार और शादी आदि के लिए। गुड़िया की बात करें तो यह वाराणसी, मऊ, गाजीपुर, चंदौली और आजमगढ़ क्षेत्रों में तस्करी और वेश्यावृत्ति के खिलाफ मुहिम है। एक बात यह भी है कि अगर औरते अपनी इच्छा से इस दलदल से नहीं निकलना चाहती तो हम उन्हें जबरजस्ती नहीं कहेंगे फिर भी मदद के लिए हमेशा तैयार है। लेकिन बच्चों को बचाना जरूरी है क्योंकि इसकी रजामंदी कानून में भी नहीं है। हांलही के एक केश में अपारधी को बचाने के लिए 12 साल की लड़की को कोर्ट पहुंचने से पहले ही अगवा कर लिया गया। हमारे प्रयास से वह अब उनके चंगुल से बाहर है। अफसोस इस बात का है कि यह लड़ाई सिर्फ एक से नहीं बल्कि उस पूरे गैंग से हैं। जो अपने स्वार्थ में अंधा हो कर बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं।

 शिवदासपुर में करीब 120 और मऊ में 70 बच्चों को यह संस्था शिक्षित कर रही है। कानूनी तौर पर भी 186 केस और 586 अभियुक्त दोषी केस है। जिसे हमारे वकील गोपाल कृष्णा और तनवीर अहमद देखते हैं। इन्हें सिर्फ इस दलदल से बचाते ही नहीं है बल्कि कुछ आर्थिक मदद देने के साथ ही इन्हें प्रेरित करते है कि ये अपना भविष्य बना सके। कुछ रोजगार से भी जुड़ सके। वाराणसी के ही मानसरोवर घाट किनारे खुले आसमान के नीचे एक नांव पर इन्हीं गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल बनाया गया है। जिसकी खासियत उसका सोलर पैनल से चलने वाला कंप्यूटर और लाइटिंग व्यवस्था है। इसी स्कूल तीसरी कक्षा में पढ़ रही पीहू कहती है मैं पैसों की तंगी के कारण अपने स्कूल नहीं जा पा रही थी लेकिन यहां रोज आती थी अब फिर से मैं वहां भी जा सकूंगी। टॉम और आजा विदेशी जरूर है लेकिन गुड़िया के साथ काम करना उन्हें दिल से अच्छा लगता है। अजीत की हमसफर मंजू भी इस पूरे मुहिम में हर कदम उनके साथ होती है। यहां तो हम यही मानते हैं कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और नेक काम में काफी अड़चने भी आती है। हमें भी कानूनी और सामाजिक दोनों तरह से बाधांओ का सामना करना होता है और तीसरी बांधा है बच्चों की तस्करी में जुटे दलाल। इसलिए एक मॉडल बानाने का प्रयास होना चाहिए। शोषण तो किसी भी तरह से सही नहीं होता है, इसके खिलाफ आवाज बुलंद होनी ही चाहिए। आज हमने उस इलाके में स्कूल खोला है जहां रेड लाइट एरिया है आस-पास के 8 मकान भी सीज किए गए। ताकि बच्चों को परेशानी न हो, उन्हें उनकी अपनी उस जिंदगी से परिचित कराया जिसमें वह महफुज हो। उन्हें किताबी ज्ञान तक ही सिमित नहीं रखते। पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट, मेडिटेशन आदि भी कराते हैं। इन सब कामों मंे किसी से सहायता की उम्मीद करना अपने आप से बेमानी है। जिस इलाके की तरफ लोग देखना पंसद नहीं करते थे आज वहां साकारात्मक बदलाव देख उनकी जुबा भी कहती है- यह होता है नेकी करने का जज्बा।

(वाराणसी में लड़कियों की तस्करी और वेश्यावृत्ति के खिलाफ काम कर रही संस्था गुड़िया के अध्यक्ष अजीत सिंह से हुई बातचीत)

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

सोच बदलती है गांव की तस्वीर



"मेरी समाज से अपील है कि औरतों की रक्षा के लिए उन्हें आजादी दे। और उनके लिए कानून न बनाकर केवल और केवल उनके सहयोगी समाज का निर्माण करने से ही इनकी की समस्या का निदान हो सकता है।" खेड़ी नारूह गांव के कामरेड सुमेर सिंह का यह कथन उनकी अपनी डायरी के पन्नों में लिखा हैं। लगभग 1500 साल पहले बसा यह गांव हरियाणा राज्य के करनाल जिले में आता है। जाटों की अधिकता वाला यह गांव लड़कियों की अच्छी संख्या की वजह से काफी समय से चर्चा का विषय बना हुआ है। खेती भी अच्छी होती है। 10-12 हजार लोगों की आबादी वाला यह गांव सबके लिए एक मॉडल बन गया है। डेनमार्क की एक कंपनी केमिनोवा ने तो इस गांव को गोद भी ले रखा है। साथ ही इसकी प्रगति के लिए हर संभव मदद करने को भी तैयार है। लेकिन 2009 के आकड़ो के देखा जाए तो यहां 1857/1000 लिंगानुपात पाया गया। जबकि 2011 की जनगणना में 920/1000 का लिंगानुपात पाया गया। इस बात को गांव का हर व्यक्ति जानता है कि गांव में लड़कियों की संख्या ज्यादा है। अब यह आकड़ो का यह खेल किसी को समझ नहीं आया। लड़कियों की संख्या ज्यादा होना यहां स्वभाविक है क्योंकि यहां के लोगों की सोच में भेद-भाव नहीं है। कुछ समय पहले ही एक गर्भवती महिला के पेट में दर्द होने लगा जिसकी वजह से वह अल्टासाउन्ड कराना चाहती थी। उस समय वहां के पैथालाजी वाले व्यक्ति ने उसके परिजनों को डाक्टर से लिखवाकर लाने को कहा फिर टेस्ट किया। इसका सीधा मतलब यही है कि कानून का डर और लोगों की समझदारी दोनों ही लड़कियों के लिए हितकर साबित हो रही है।

गांव के लोगों से बातचीत करके एक और बात सामने आई कि यहां धार्मिक तौर भी भ्रूण हत्या को पाप माना जाता है। यह भी एक कारण है कि बेटियों को मार कर लोग पाप के भागीदारी नहीं बनना चाहते। सुमन एक गृहणी है, उनका कहना है कि लड़कियों को आत्म निर्भर बनना चाहिए। सुषमा भी एक गृहणी है जो मानती है कि उनका गांव सबके लिए मिसाल है, उनके यहां भूण हत्या नहीं होता। लड़कियों को पढ़ने, आगे बढ़ने का पूरा मौका दिया जाता है। सुमन एमबीए कर रही है, इनके परिवार में ये तीन बहन और एक भाई है। ऐसा ही आकड़ा अधिकांश इस गांव के हर घर में देखने को मिलेगा। इनका कहना है कि पढ़ना ज्यादा जरूरी है। नौकरी करना न करना तो हम पर निर्भर है। गांव की लड़कियां खेल में भी काफी आगे हैं। और फुटबाल इनका पसंदीदा खेल है। राज्य स्तर पर भी लड़कियां कैप्टन रहते हुए कई खिताब अपने नाम कर चुकी है। हाल में ही रूबी को खेल कोटे से ही पुलिस में नौकरी मिली और बीना नरवाल को लेफटीनेन्ट पद। सीमा एमएसी और बीएड की हुई है पढ़ाती है। उनके अनुसार लड़कियो को हर क्षेत्र में आगे जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हमारे गांव से लड़कियां विदेश भी जाकर नौकरी कर रही है। लेकिन गांव में भी और तरक्की की आवश्यकता है।

गांव के सरपंच संदीप सिंह नरवाल का कहना है कि गांव के यह आकड़े लड़कियों की संख्या में अचानक इतना गिरावट दिखा रहे हैं तो यह संभव ही नहीं है इसलिए फिर से इन्हें दुरूस्त करने की जरूरत है। यह तो पूरा गांव जानता है कि यहां लड़कियों की संख्या अधिक हैं। गांव की एक समस्या यह है कि यहां स्टेडियम की मांग खेल कूद को प्रोत्साहन देने के लिए रखी गई। जो पूरी नहीं हो रही। गांव की समस्या तो और भी है जैसे पानी निकासी, मनरेगा। सबसे बड़ी बात यह कि यहां स्वास्थ्य केंद्र के नाम पर कुछ भी नहीं है। नाम का एक मिनी केंद्र है। इस गांव में स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है। करनाल ज्यादा दूर नहीं है फिर भी गांव में प्राथमिक चिकित्सा का अभाव खलता है। इस गांव को मुख्यमंत्री सौंदर्यी करण योजना के तहत जिले में दूसरा स्थान मिला और पढ़ाई में प्राइमरी स्कूल को पहला। एक बिना पढ़े-लिखे इस गांव के बलबीर सिंह नरवाल की बेटी ने बीएससी में कुरूक्षेत्र यूनिवर्सिटी में टॉप किया।  गांव के विकास के लिए मिली धनराशि को रैली, पोस्टर कैंप में प्रयोग कर जागरूकता  लाने की कोशिश भी की जाती है। गांव की साफ सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। केमिनोवा की तरफ से डॉक्टरों की टीम ने स्कूल में स्वास्थ्य जांच कर बच्चों में प्रोटीन बांटने का काम भी किया। खेडी नारूह गांव बसने का अपना इतिहास है लेकिन आज जिस तरह लिंगानुपात में गिरावट आ रही है। खास तौर से शहरों में इसका सीधा संबंध आधुनिक जांच तकनीक से जूड़ता है। ऐसे में खेड़ी जैसा एक भी गाँव अंधेरे में दिया जलाने का काम कर रहा है। गांवके लोगों की सोच है कि लड़कियां पढ़ेगी, बढ़गी तो एक नहीं बल्कि दो घरों को सवारेंगी। 

सुषमा सिंह 

सोमवार, 16 जनवरी 2012

सेवा भाव का सपना हुआ सच


जब हम सोचते रहते हैं कि हमें ऐसा करना है वैसा करना है उस समय वो सोच या हमारा सपना सच हो यह जरूरी नहीं है लेकिन यदि उसके पीछे सच्ची आस्था हो तो सपने को हकीकत होने से कोई नहीं रोक सकता है। ठीक ऐसा ही हुआ दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में जब बचपन से ही सेवा भाव की इच्छा रखने वाले एक संस्था के अध्यक्ष कमल जीत वैद्य ने शिरडी साई बाबा के दर्शन के बाद वापस दिल्ली आकर 18 अगस्त 2009 में ‘असहाय जन सेवा समिति’ की शुरूआत की। आज करीब 65 सदस्यों से जुड़ी इस संस्था के लोग अपने परिवार और कार्यलय के बाद का समय लोगों की सेवा में लगाते हैं। जो स्थाई रूप से कहीं कार्यरत है और उनके भीतर भी सेवा भाव की लालसा है। कमल जी बताते हैं कि इस जन सेवा की शुरूआत एक ऐसी गरीब लड़की की शादी के साथ हुई जो तीन बहने थी और बिल्कुल असहाय। उसके बाद मदद का जो सिलसिला चला वह हर क्षेत्र में बढ़ता गया। क्योंकि सेवा की आवश्यकता का कोई निश्चित क्षेत्र नहीं होता है। इसलिए जिन्हें भी जरूरत हो उनकी सेवा के लिए तत्पर है। अब उस पहली शादी की प्रेरणा से ही 21 फरवरी 2012 को भी 21 निर्धन कन्याओं की तीसरा सामुहिक शादी करवाने की योजना है। जिसमें शादी में होने वाले खर्च को संस्था ही वहन करेंगी। 
असीमित सेवा का सपना लिए इस संस्था समय समय पर गरीब बच्चों के बीच दौड़ और चित्रकला प्रतियोगिता भी करवाते हैं जिससे उनकी प्रतिभा सबके सामने आ सके। गरीब तबके के बच्चों को छात्रवृति देने के साथ ही पढ़ाई के लिए कॉपी किताब भी उपलब्ध कराए जाते हैं। छात्रवृति देने का निर्णय उनके परिक्षा परिणाम को देखकर तय किया जाता है। ताकि गरीबी और अमीरी शिक्षा के बीच रूकावट न बने। हमारी नयी पीढ़ी को संस्कृति से जोड़े रखने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम  का भी आयोजन किया जाता है जिसमें खास तौर पर युवा पीढ़ी को समय के साथ अपनी संस्कृति को कैसे संजोये बताया जाता है। ठंड में साथ ही कम्बल और स्वेटर का वितरण भी किया गया क्योंकि हमारी जनता भूख से ज्यादा ठंड से मरने की कगार पर पहंुच जाती। योग ध्यान शिविर भी करवाए जाते हैं। जो अपनी पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं ऐसे बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा केंद्र और महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र खुलवाया गया है। गरीब बच्चों को जानकारी से रूबरू करवाने के लिए ज्ञान-विज्ञान के अंतर्गत मदर डेयरी प्लांट का भ्रमण भी करवाया गया। पिछले साल रक्तदान शिविर भी लगाया गया। इस साल ही क्षेत्र में वृक्षारोपण कराने के साथ ही अनेक गरीब महिलाओं का वृद्ध  पेंशन, विधवा पेंशन और विकलांग पेंशन बनवाया गया। एक साथ कई समाजिक कामों को अंजाम देने वाली इस संस्था को मदद के लिए खुद ही प्रयास करना होता है जहां पच्चास से छह सौ रुयये तक की मदद हर माह सदस्यों द्वारा की जाती है। संस्था द्वारा लाभान्वित लोगों, विवाहिताओं का साफ कहना है कि छोटी सी मदद से उनकी जिंदगी में नई आशा मिली है। 
संस्था से जुड़े धर्म सिंह का कहना है कि ऐसे तो नाम के लिए बहुत से एनजीओ स्लम में दिखते हैं लेकिन वास्तव में काम नहीं होता है। इसलिए जरूरी है कि लोगों की सेवा का भाव हो। इनकी आगामी योजना है कि गरीब बच्चों के लिए निशुल्क कंप्यूटर केंद्र खोला जाए जिससे यह बच्चे समय के साथ तकनीक को समझ सके। बुजुर्गों के लिए आश्रम की व्यवस्था की भी तैयारी है जिससे विर्द्धो को भटकना न हो। आम लोगों की स्थानीय तौर पर मदद के लिए उनकी छोटी से छोटी समस्याओं के समाधान जैसे राशन कार्ड, वोटर लिस्ट में नाम न होने, पहचान पत्र, विधवा पेंशन, जाति प्रमाण पत्र, विकलांग प्रमाण पत्र, मूल निवास प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर द्वारा मुफ्त सलाह की व्यवस्था करते हैं। इसी मुद्दे पर संस्था में कार्यरत सतीश कुमार वैद्य का कहना है हमें कोई सरकारी मदद नहीं मिलती अगर मिल भी जाए तो वहां हमारा सेवा भाव कम लगता है क्योंकि सब यही सोचने लगते हैं कि यह सब सरकार कर रही है तो संस्था का योगदान है ही क्या। जबकि ऐसा नहीं होता है। हम चाहते हैं कि भविष्य में इस इलाके में ही एक ऐसे स्कूल की स्थापना की जाए जहां गरीब बच्चों को कम मुल्य में ही वह सभी सुविधाए मिल सके जो आज सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में ही उपलब्ध है। संस्था के मूल में यही बात है कि सेवा हर उस व्यक्ति तक पहुंचे जिनको हमारी जरूरत है क्योंकि महिला आधी दुनिया को समेटे हुए है तो बच्चे देश का भविष्य और युवा वर्तमान है। हमारे बुर्जुग इनको राह दिखाने का एक जरिया। 

सुषमा सिंह


बुधवार, 7 दिसंबर 2011

कहां है मीडिया सर्वोकार ?


चौथे खम्भे का काम अब 4सी (क्राइम, क्रिकेट, सिनेमा और सेलिब्रटी) से पूरा नहीं हो पा रहा। 6सी का कांसेप्ट आ रहा है। दो अन्य है "करप्सन और कारपोर्टेजाइशन" 


एलपीजी (लिब्रेलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन) और सूचना विस्फोट के इस दौर में कोई कहता है कि सूचना में भ्रष्टाचार नहीं तो अविश्वासनीय ही है। भारत के पिछले कुछ दशक के आकड़ों को देखे तो साफ तौर पर जाहिर होता है कि जहां अन्य देशों में प्रिंट मीडिया का अस्तित्व खतरे में नजर आने लगा है वही भारत में पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की अपनी चमक बरकरार है। रेडियो  अपने मन के हिसाब से बज रहा है। तो बेव में भी समाचार विचार की धूम मचने लगी है। मीडिया के तेवर तो वैसे ही है बस बदला है तो उनका अंदाज और विषय। जिसे समय की मांग भी कह सकते हैं। तात्कालिक आकड़ों पर नजर डाले तो देश में 77,600 अखबार विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होते हैं। 58 करोड़ पाठकों की संख्या है। मतलब आधी आबादी अभी पढ़ने की आदि नहीं है। 550 चैनल है, जिनमें से 250 अभी अधर में हैं। 13 करोड़ 80 लाख लोगों के घरों में टी.वी. है। इनके साथ ही 50 हजार स्थानीय टी.वी ऑपरेटर है। ऐसे में अगर मीडिया के एक भी माध्यम में भ्रष्टाचार का कीड़ा लगा तो उसे पूरे मीडिया तंत्र में फैलते देर नहीं होगी। हुआ भी कुछ ऐसे ही राजनीति से शुरू हुआ भ्रष्टाचार आज समाचार विचार को निगल रहा है। आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में समाचार को भी व्यक्ति मनोरंजन के तरह ही देखने लगा है। उसे दो-चार लोगों के मरने वाली घटना से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। जब तक बड़ी तबाही न हो। क्योंकि यह भी आदत बन गई है। गाहे बजाहे ऐसी घटनाएं तो रोज ही होती है। कौन सा कोई सगा है हमारा। अब पड़ोसी के घर से धुंआ क्यों आ रहा है, इसकी चिंता फायरब्रिगेट वाले करें। नेता या पत्रकार तो दौरे पर ही नजर आएंगे। इतने के बावजूद भी इक्के दुक्के पत्रकार मिल ही जाएंगे, जो आज भी पत्रकारिता को जीवित रखे हैं। अब मजबूरी हो या हमारा स्वार्थ, नैतिकता तो धरासाई हो ही रही है। 

पेड न्यूज का कानसेप्ट भी भ्रष्टाचार के कारण ही मीडिया में आया है। जिसे जब जो भी खरीदना या बेचना है, सभी स्वतंत्र है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता सबको मिली हुई है। मीडिया को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है क्यों कि यह सरकार और आम जनता के बीच सेतु का काम करते है। समाज के हितों की रक्षा के लिए भी कार्यरत रहते हैं। अफसोस इस बात का है कि चौथे खम्भे का काम अब 4सी (क्राइम, क्रिकेट, सिनेमा और सेलिब्रटी) से पूरा नहीं हो पा रहा। 6सी का कांसेप्ट आ रहा है। दो अन्य है "करप्सन और कारपोर्टेजाइशन" यह बात अलग है कि लोकपाल की मांग पहले लगभग 50 दभा की गई होगी। लेकिन अन्ना आंदोलन की वजह से यह व्यापकता के साथ देश ही नहीं विदेश तक भी पहुंचा। इसमें सबसे ज्यादा रोल मीडिया का ही रहा। कारण साफ है 6सी और टीआरपी। इन सब के बावजूद भी मीडिया को हम पूरी तरह से भ्रष्ट नहीं कह सकते हैं। कुछ पत्रकार और संपादक है जो पूरी सच्चाई के साथ काम करना चाहते हैं। उन्हें भ्रष्ट करता है बाजार और ऐलिट वर्ग जो कतई यह नहीं चाहेगा कि मीडिया व्यापार में थोड़ा भी नुकसान हो। 
आज रेडियों की  पहुंच 99 प्रतिशत तक हो गई है। भारत का दुनिया में दूसरा स्थान है समाचार पत्रों की रोजाना प्रकाशित प्रतियों को लेकर। चीन में  इसकी संख्या 13 करोड़ है तो भारत में 9 करोड़ है। निजीकरण के दौर में भारत के 294 शहरों में 839 रेडियों एफएम शुरू होने वाले हैं। सोशल नेटवर्किंग तो मीडिया की सारी दीवारों को तोड़ उपभोक्ता, पाठक या दर्शक वर्ग को जागरूक बनाने का काम तेजी से कर रहा है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ समाज में अब हिंसा और क्रुरता में भी शासकों को मनोरंजन ही नजर आने लगा है। पूंजीवाद की दुनिया में साहित्य, कला और सूचना कमाई का जरिया बन गए हैं। दशर्क उपभोक्ता बन गया है। देश चलाने वाले जनता की संवेदनाओं के साथ खेल रहे हैं। इसमें उनका साथ दे रही है मीडिया जो संवेदना, जिज्ञासा, कौतुहल और मनोविज्ञान को अपना हथियार बना देश की जनता को ही पागल बना रही है। यह तो सोचने वाली बात है ही कि मनुष्य राजनेताओं के लिए सिर्फ मतदाता और बाजार के लिए सिर्फ उपभोक्ता ही समझा जाता है। इसके अलावा कुछ नहीं। ऐसे में भ्रष्टाचार की लगाम के लिए छोटा प्रयास और किसी भी कारण से उसमें मीडिया का साथ देना। शायद फिर से हमें उस पत्रकारिता की तरफ मोड़ सके जो आजादी के समय थी। समाज की प्रत्येक व्यक्ति की आजादी की पत्रकारिता होनी चाहिये। आज हम तरक्की तो कर रहे हैं। लेकिन अपने नैतिकता को खत्म कर के। भ्रष्टाचार और नैतिकता पर देश में मीडिया में लोग प्रवचन देते रहते हैं यह जानते हूए भी कि भारत पूरे विश्व में भ्रष्टाचार के मामले में तीसरे नंबर पर है। 

वर्तमान समय में मीडिया इस मुलभूत प्रश्न को कैसे पेश करती है? यह जानाना भी रोचक है। आज की मीडिया और उनके पत्रकार दोनों जनता को पुचकारने में लगे रहते हैं। जैसे इनसे ज्यादा हितैसी तो कोई हो ही नहीं सकता। फिर भी यह  नहीं कह सकते कि पत्रकारिता बची ही नहीं है। जो पत्रकार बचे हैं सच के साथ वो बाहरी दुनिया में जाने से कतराते हैं, कहीं वह भी बाकी सब की तरह उन्हीं के रंग में न रंग जाए। एलिट वर्ग अपनी मानवीय संवेदनाएं खोता जा रहा हैं। गांवो को तो तब्बजुम ही नहीं दिया जाता। पत्रकारिता की खबरे गांव में बसे भारत से ही निकलती है इसलिए इस ओर पत्रकारों को ध्यान देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों के संकट आ चुका है। पत्रकार न ही व्यवसायिक दक्ष हैं न ही कुशल। उनके प्रश्न और प्रस्तुति केवल पब्लिसिटी के लिए होते हैं। पत्रकारों को भारतीय अधिनियम की धाराओं और कानून का ज्ञान न के बराबर है जिससे पत्रकारिता दिशाहीन हो जा रही है। चाहे सत्ता हो या प्रशासनिक व्यस्था या कोई संस्था  व्यक्ति कुर्शी पर बैठ जाता है तो वह निर्णय भी अपने अनुसार ही लेता है। निर्णय की यह छुट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते ही सही गलत का भान न करते हुए वह कभी ऐसे काम भी कर जाता है कि न चाहते हुए भी वह मानव जाति का दुश्मन बन जाता है। जरा सोचिए, अंग्रेजो के समय के कानून आज तक चल रहे हैं। जिसका खामियाजा भूगत रही है आम जनता। यदि उनकी भूमिका का दायरा सिमित कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगया जा सकता है। विभिन्न राजनीतिक पाटिर्यों ने देश की हर चींज को बाजार में लाकर खड़ा कर दिया। आज तो भ्रष्टाचार से सब के पास पैसा या कह ले काला धन हो गया। मंत्री, अफसर, मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका, सेना, सांसद, उद्योगपति सभी आज भ्रष्टाचार में रंगे नजर आ जाएंगे। आज जो चीजे अच्छी बताई जा रही है वो बाजार में हैं। गाँधी की फोटो लगा कर, ईमानदारी का ढोंग किया जाता है। लेकिन उनकी नीतियों को अपनाने से कतराते हैं। 
अटपटी और चटपटी खबरें मीडिया की शोभ बढ़ा रहे हैं। पूरा का पूरा पेज या समय ही राजनीतिक पार्टियां खरीद लेती है। पार्टीयों और मीडिया का गटबंधन 100   साल से भी ज्यादा किसी भी पार्टी को देश पर राज करवा सकता हैं। पटना में देश के माने युवराज जाते हैं और खबर बनती है की लड़किया उनको देख कर चिल्ला रही थी जैसे की कोई हीरों हो। पत्रकार उसी को हेडलाइन बनाने में व्यस्त हो जाते हैं। लोकतंत्र के लिए तो जरूरी है वोटो के रूप में समर्थन पाना है वो पाने के लिए चाहे मीडिया को क्यों न भ्रष्टाचार में लाना हो, सब होगा। 
जब सच के लिए कोई जगह न बचती नहीं दिखी तो ब्लॉग लिख कर ही सच्ची पत्रकारिता की अलख जगानस शुरू हो गया। सही है राह कोई भी हो इरादा नेक होना चाहिए। नरेगा घोटाला, चारा घोटाला, लवासा घोटाला, अनाज घोटाला, चीनी घोटाला, राजमार्ग घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, संसद घोटाला, आदर्श घोटाला, बैंक घोटाला का सच छुपाने में मीडिया भी सबका का साथ बकायदा दे रही है। तहलका का सलेक्टिवली रिपोर्टिंग का सच, पत्रकारों के पदासिन होने का सच, नेपाल को मओवादियां के हाथो में सौप देने का सच, संसद में नोट कांड के सच पर, क्या सब मीडिया और समाज से छुपा हैं या हम जान कर अपनी आंखे बंद किए हुए हैं। क्यूँ अफजल और कसाब को अभी तक फंसी नहीं हुई है। अभी हल ही में आई  "बोल"  फिल्म मीडिया के लिए अच्छा उदाहरण है।
मीडिया खुद पर लगाम लगाने की बात करता है। क्या यह संभव है। भ्रष्टाचार जहां विकृतियों को जन्म देता है। वहीं वो गरीब को और भी गरीब बनाता है। सरकार जिस बेशर्मी के साथ भ्रष्टाचार को पनाह दे रही है और सी बी आइ, आयकर विभाग भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। कभी तो वो समय आएगा ही जब सब जग जाहिर होगा। भ्रष्टाचार कर आचार देखने को मिलेगा। तब और भी चटकारे लेगी यह मीडिया। सभी मामलो में सरकार और मीडिया को भ्रष्टाचार को एक नजर से देखना चाहिए। सरकार मीडिया का मुह बंद रखने के लिए जो विज्ञापन देती है वो भी हमारे आम जनता मध्यम वर्ग की कमाई के होते हैं। मीडिया वाले क्या करते  हैं  उनका हिसाब जनता या सरकार के पास क्यों नहीं होता हैं। अन्ना दल के सदस्यों को बारी बारी निशाना बनाया जाना। यह  सिर्फ राजनीतिक सामाजिक आंदोलन का हिस्सा नहीं है बल्कि राजनीति और मीडिया तंत्र और समाज के बीच जो लड़ाई चल रही हैं। उसमें समाज के हार के रूप में भी देख सकते हैं। लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म भले ही न हो, लेकिन वह सवालों की जबाबदेही के लिए, सूचना का अधिकार कानून की ही तरह एक कारगर हथियार जरूर बन सकता है। अन्ना दल को अब वक्त का इंतजार करने के साथ ही आगे बढने की जरूरत हैं। नहीं तो अंत का पूर्ण अंत करने में एलिट वर्ग को देर नहीं लगेगी। 

आज देश की आजादी के बावजूद भी क्या बेगुनाहों, मजबूरों के साथ इंसाफ हो रहा है, मजदूरों को उचित मजदूरी मिल रही है, बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है और न जाने ऐसे ही कितने सवाल हैं जिसका जवाब है न मीडिया के पास है न सरकार के पास। इस देश में अमीर और भी अमीर होता जा रहा है और गरीब, गरीब होता जा रहा है। सर्वशिक्षा अभियान से बच्चों के किताबें और खाना की व्यवस्था तो हो गई है। लेकिन क्या आज ऐसे स्कूल नहीं है, जहां बच्चों के लिए आने वाला राशन किसी और के पास जाता हो? देश में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, मजदूरी कर रहे हैं। सबसे ज्यादा परेशान युवा हैं। पढ़ सका वो भी, और जो न  पढ़ सका वो भी। नौकरी के लिए दर दर भटक रहा है, रिश्वतों के बिना नौकरी लगना असंभव सा ही हो गया है। सरकार ने एक न्यूनतम मजदूरी तय कर रखी है मगर करोड़ों की संख्या में ऐसे नौकरीपेशा हैं जिन्हें सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी से कम पैसा मिलता है। तनख्वाह इतनी होती है कि एक वक्त ही पेट भर खा पाते हैं तो अगले वक्त का सोचते हैं । यही हाल है पत्रकारों का भी। आए दिन ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं की फलां गांव में फलां व्यक्ति ने गरीबी से तंग आकर जान दे दी। हजारों टन अनाज रखे-रखे सड़ जाता है, तो कहीं भूख से किसी की मौत हो जाती है। शर्म की बात नहीं तो और क्या है। किसानों के देश में किसानों के साथ ही धोखा हो रहा है। उनकी जमीन छीनी जा रही है। कहा सो जाती है मीडिया ऐसी खबारों के समय। नेताओं की यात्रा किसान की मौत से ज्यादा जरूरी है। आज हर तरफ से भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं। जिसे जब मौका मिला उसने देशवासियों को लूटा है। हमारे देश में बुद्धिजीवियों  की कमी नहीं है। मगर अधिकतर या तो दिखते ही नहीं या फिर उनसे सिर्फ उन्हीं लोगों को लाभ होता है जो दांव पेंच में माहिर होते हैं। जो गरीब हैं उन्हें इंदिरा आवास का घर नहीं मिल रहा, तो मीडिया का पूरा घराना  हैं। गरीबों का नाम बीपीएल में नहीं है और कार्ड के मजे दूसरे ही ले रहे हैं। भूख से लोग मर रहें है, किसान खुदकुशी कर रहें है, बच्चियों को कोख में ही मार दिया जा रहा है, बाल मजदूरी हो रही हैं। ऐसी परिस्थिति में कहा है आजादी मीडिया और देश दोनों की। क्या गांधी जी का सपना कभी पूरा होगा? पत्रकारिता  पीत फिर प्रेत अब पेज-3 में तब्दील हो गई है। पी से पब्लिक का  तो कही नामोनिशा नहीं है। बेईमानी इतनी ज्यादा हावी हो गई है कि इमानदारी के लिए जगह ही नहीं बचती है, ऐसे में मिडिया में भ्रष्टता वाकई खटकती है | क्योंकि पूरा माकन खम्भों पर ही टिका होता है| एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ने लगता है| भारत में मीडिया कि स्थिति में अभी सही मायने में  और  परिपक्वता कि जरूरत है| उदाहरण में सहारा समूह ने भ्रष्टाचार कि अपनी एक गलत खबर के लिए 9 साल बाद क्षमा मांगी|  जरुरत है मीडिया को सच्चाई से अवगत करते हुए नींद से जगाने की |

सुषमा सिंह 

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

आगाज़

अंधे बाप के बेटों ने ये कैसा अनाचार किया |
लड़ न सके वीरों से तो नारी पर अत्याचार किया ||
भरी सभा में खीच कर लाया भाभी का अपमान किया |
चीर हरण करने की कोशिश बीच भरे दरबार किया ||
असहाय पड़े थे वीर योद्धा कहने को लाचार भीष्म |
औरों को क्या कहे जहा भीष्म पितामह तक हुए  लाचार ||
द्रौपदी न छोड़ी अपने प्रिय सखा को , जिसका साडी फाड़ उपचार किया |
क्रांत भावना से इस दुःख में पुकार-पुकार कर आह्लाप किया ||
दौड़ पड़े नंगे पग से अपनी बहन का सम्मान किया |
द्रौपदी की साड़ी को साड़ी ही नहीं अम्बर के सामान किया ||
खीच-खीच कर हारे थक कर जब चूर हुए |
भरी सभा में खड़े खड़े सब लज्जा से चकना चूर हुए ||
बची लाज श्यामा की जो प्रिय सखा को याद किया |
अपनों से ज्यादा जो श्रद्धा, विश्वास पर आधार मिला ||
खोल दिया अपने जुड़े को महाभारत का निर्माण किया |
कर प्रतिज्ञा पूरी विश्व को नया अभिमान दिया ||

by shitala ji

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

बच्चों के सपनों को साकार करती संस्था


अशिक्षा एक ऐसा कारण है जो किसी भी देश के विकास में बाधा का काम करता है। यही वजह है कि माइक्रोसाफ्ट में कार्यरत ‘जाॅन वुड’ अपनी नौकरी छोड़ सबसे पहले 2002 में नेपाल के एक छोटे से गांव में ‘रूम टू रीड’ की नींव रखी। धीरे-धीरे यह सफर बढ़ता गया और आज दुनिया के 9 देशों में यह संस्था काम कर रही है। भारत में भी आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट, राजस्थान, उत्तरांचल और दिल्ली जैसे नौ राज्यों में इसका काम सरकार के साथ मिलकर कुशलता स ेचल रहा है। हालांकि भारत में इसकी शुरूआत 2003 में राजस्थान और दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लाइब्रेरी बनने के साथ हुई। भारत में एक मिलियन बच्चों के साथ काम कर रही इस संस्था ने अभी तक 4,120 लाइब्रेरी बनवाई है और 7,86500 किताबों को सात भारतीय भाषाओं में प्रिंट करा कर बच्चों तक उपलब्ध कराया है। 2,882 लड़कियों को अपने प्रोग्राम से जोड़कर उन्हें शिक्षित और आत्म निर्भर बनानेे का प्रयास किया है। इस संस्था द्वारा मूल रूप से चार कार्यक्रम चलाए जाते हैं। पहला है ‘रीडिंग रूम’, दूसरा ‘लोकल लैग्वेज पब्लिसिंग’, तीसरा ‘स्कूल रूम’ और चैथा है ‘लड़कियों की शिक्षा’।

पूरे भारत में 76 कार्यकताओं के साथ काम कर रही इस संस्था की भारत मंे निदेशक सुनीशा आहुजा कहती है कि लड़कियों की शिक्षा के प्रोग्राम के तहत जब हम बिकानेर के तीन गांव में सर्वे किया। उसके बाद वहां बालिका शिविर लगाया। जिसमें लड़कियों की संख्या 72 से 48 हो गई थी। क्योंकि वह ऐसी लड़कियां थी जो कभी स्कूल गई ही नहीं थी। उनका परिवार और समुदाय उनकी पढ़ाई में सहयोग नहीं करता था। वहां हम आज भी काम कर रहे हैं। लेकिन शुरूआती दौर में ही हमे यह सीख मिली की हमें सिर्फ बच्चियों के पढ़ाई के स्तर पर ही नहीं उनके परिवारि और समुदाय केस्तर पर भी काम करना होगा। इसी का परिणाम है कि हम स्कार्लशिप देने के साथ ही उनके पूरे समुदाय के साथ जुड़ कर काम करते हैं। सबसे पहले हमने लाइब्रेरी का कार्यक्रम 2003-04 में 65 स्कूलों के साथ शुरू किया था। आज इनकी संख्या चार हजार से ज्यादा हो गई है। जहां विभिन्न प्रकाशकों से किताबे मंगवाने के अलावा खुद भी प्रकाशन किया जाता है। बच्चों की रुचि के अनुसार 100 नई कहानियों का प्रकाशन तीन भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी और तेलगु में किया गया है। इससे बच्चों के लिए लिखने वालों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

इस संस्था की इस वर्ष के विदेशी फन्ड की बात करें। तो 75 प्रतिशत मदद विदेश का ही है। इस मामले में आहुजा जी मानती है कि किसी भी देश का कोई भी बच्चा अगर शिक्षित है तो इसका प्रभाव दुनिया पर होता है। मदद कहीं से भी मिल रही हो। जरूरी यह है कि हम मिल कर काम करें। जिससे सबका विकास हो सके। भारत में ही चार अन्य राज्य सरकार ‘रूम टू रीड’ को अपने प्रोग्राम में शामिल करने और 15-20 हजार स्कूलों में कार्यक्रम चलाने का प्रस्ताव दे रही है। उनमें झारखंड भी है। संस्था किसी भी राज्य में कार्य करते समय तीन साल का एग्रामेंट करवाती है। जिसके तहत सरकार को साथ मिलकर काम करना होता है। बच्चों को किताबें दिलाना, पुस्तकालय खुलवाना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, बच्चों के विकास के लिए अन्य गतिविधियां करना मुख्य रूप से शामिल होता है। सरकार के साथ काम करने का कारण यही है कि जब संस्था वहां से काम पूरा कर ले उसके बाद स्कूलों को ज्यादा परेशानियों का सामना न करना हो।

इस वर्ष ही संस्था ने दो रिसर्च किए। जिसका उद्देश्य यह जानना था कि 12वीं की बाद लड़कियां अपने भविष्य के लिए क्या करना चाहती है। और इसके लिए उनकी तैयारी किस प्रकार कराई जा सकती है। कोई आगे पढ़ना चाहती है जो कुछ अपना काम शुरू करना, कुछ नौकरी करना चाहती है। ऐसे में पिछले साल ही छोटा सा पाइलेट प्रोजेक्ट 300 बच्चियों के साथ शुरू किया गया। उसमेें उनकी कार्य क्षमता को निखारने के अलावा उनकी मूल शिक्षा को ठोस बनाने का प्रयास भी किया जा रहा है। जिससे वह आगे जो भी करना चाहे कर सके। इसके लिए उन्हें स्कार्लशिप भी दिया जाता है। इसके चयन का आधार है। वह जगह जहां महिला शिक्षा दर राष्टीय महिला शिक्षा दर से कम हो और ऐसे स्कूल जहां अधिक संख्या में लड़कियों द्वारा पढ़ाई छोड़ दी गई हो। अब एक-एक बच्चे का चुनाव करने की जगह स्कार्लशिप के लिए उस पूरी कक्षा को ही चुन लिया जाता है।

अभी तक इस संस्था से लगभग 30-35 लड़कियां 12वीं पास कर चुकी है। उनमें से कुछ ने एनजीओ में ही काम कारना पसंद किया तो कुछ ने बीपीओ में और दो लड़कियां काॅलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। देश-विदेश में कार्यात यह संस्था अपनी समाजिक कामों के लिए लगभग दस बड़े सम्मानों से नवाजी जा चुकी है।  

बुधवार, 24 अगस्त 2011

हम सब अन्ना (हम सब भारतीय है)

अन्ना के आन्दोलन से देश में व्याप्त एकता को जगा दिया है .कोई फर्क नहीं पड़ता हवा का रुख क्या हो. अब क्या हमें भ्रष्टाचार मुक्त भारत मिलेगा ............




शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

भारत की नदियां


 चित्रकूट धाम की सुन्दर छवि उन सभी लोगों के जहन में होगी जो पहले गए हैं| लेकिन अब मन्दाकिनी नदी के किनारे की हालत यह तस्वीर बाया कर रही है| भारत की नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है | क्या कोई है जो इन्हें बचाना चाहता है ?

गांधी टोपी से सधती गांधी शिक्षा की राह

सुषमा सिंह\नरसिंगपुर (मध्य प्रदेश)



रोटी, कपड़े और मकान की तरह ही आज शिक्षा व्यक्ति की मूल जरुरत  बन गई है। शिक्षा  की परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से ही चली आ रही है। नालंदा जैसे गुरूकुल की परंपरा भी भारत में ही रही। लेकिन आज बदलती दुनिया के साथ शिक्षा में क्या बदलाव आया है? सरकारी और गैर सरकारी तौर पर खुलते स्कूलों में शिक्षा  का स्तर गिरता जा रहा है और अभिभावकों की परेशानी बढ़ती जा रही है। शहरों से लेकर गांव तक विभिन्न प्रकार की समस्या शिक्षा  के क्षेत्र में आ रही है। कभी दाखिले को लेकर तो कभी पढ़ाई के खराब स्तर को लेकर।
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अंग्रजों के समय से चला आ रहा प्रदेश का एकमात्र अनोखा विद्यालय सिंहपुर में स्थित है। इस विद्यालय की स्थापना काल 1868 से ही बच्चे स्कूल गांधी टोपी लगाकर जाते हैं। विगत 143 साल से यह परंपरा चली आ रही है और आज भी कायम है। इस स्कूल का नाम शासकीय उत्तर बुनियादी शाला है, जो गांधी टोपीवाले स्कूल के नाम से प्रख्यात है। स्कूल की स्थपना के बाद से ही पढ़ाई करने वाले छात्रों को टोपी पहन कर आना अनिवार्य किया गया था। टोपी लगाना कभी इनकी मजबूरी नहीं रहीं। यहां सिंहपुर के अलावा आस-पास के दर्जनों गांव की तीन पीढ़ियों तक ने अध्ययन किया है। अब तो कई बच्चे ऐसे हैं जो अपने पिता, दादा और परदादा के पढ़ने वाले इस स्कूल में अध्यनरत है। प्राथमिक माध्यमिक स्तर तक की कक्षा वाले इस स्कूल में लगभग 198 छात्र व 08 शिक्षक है जबकि 2004 में 350 के करीब छात्र और 13 शिक्षक थे। कुछ शिक्षक इसी विद्यालय में पढ़े और अब नई पीढ़ी को सही शिक्षित कर रहे हैं। इस स्कूल की खासियत यह है कि 21.7.1869 से लेकर आज तक के पूरे रिकार्ड को भी संजो कर रखा गया है। 
शैक्षणिक गुणवत्ता के मामले में भी इस विद्यालय पीछे नहीं रहा। यहां अध्ययन करने वालों छात्रों ने शिक्षा, चिकित्सा, प्रबंधन, कंप्यूटर इत्यादि के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यही से पढ़े शिवकुमार महाजन इंग्लैंड में चिकित्सक है, तो विश्वम्भर दलाल सोनी कोल डिपो में उंचे ओहदे पर कार्यरत है। इनके अलावा भी अन्य छात्र आज इस सरकारी स्कूल का नाम ऊँचा कर रहे हैं। यह एक ऐसा विद्यालय भी है, जहां के  अपने कर्तव्यों व दायित्वों के कारण समय-समय पर राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। शेख नियाज मोहम्मद को सन् 1963 में  राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के द्वारा पुरस्कृत किया गया। सन् 91-92 में ही देवलाल बुनकर व 95-96 में चौधरी नरेन्द्र कुमार शर्मा भी राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुए। बच्चों और उनके अभिभावकों को लगता है कि टोपी पहनने से बच्चों में अनुशासन की भावना आती है। वह ऐसा महसूस करते हैं कि टोपी पहनने के बाद विद्यार्थी की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर मुड़ जाती है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत शिक्षक महेशचन्द्र शर्मा अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि उन्हें याद है जब सन् 1948 में महात्मा गांधी के वर्धा आश्रम की शुरूआत हुई थी और बुनियादी शालाओं में सूत कातना, गलीचा बनना शुरू हुआ था। तब उन्होंने इस विद्यालय में टोपी पहनने की परंपरा को और सुदृढ़ बनाया। वह एक संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि सन् 1968-69 me शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने एम.डी. चौबे इस बात पर अड़ गए कि उनका बालक देवेन्द्र टोपी पहनकर स्कूल नहीं जाएगा, तब उन्होंने उसके पिता से अनुरोध किया कि आप बालक देवेन्द्र को कल से स्कूल न भेंजे। यदि आप विद्यालय की परंपराओं का पालन नहीं करेंगे, तो छात्र के लिए स्कूल में जगह नहीं है।

इसी स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक लेख राम दूबे का कहना है कि बुनियादी शाला गांधीवादी  सिद्धांत पर आधारित है। पहले यहां गांधीवादी नीतियां थी। लकिन अब सरकारी नीतियां लागू हो गई है। गार्डनिंग, दरी-गलीचे, चाक आदि बनाने के लिए पहले पैकेज भी मिला करते रहें। अब सारी सुविधाएं बंद कर दी गई है। 2-3 एकड़ के खेतों में काम किया करते थे। लखनादउ, अमरबाड़ा में भी इस प्रकार की बुनियादी शालाएं बनीं। वह अब नाम के लिए ही बची है, टोपी का तो वहां कुछ लेना देना है नहीं और कुछ भी नहीं बचा है। सिंहपुर बुनियादी शाला में टीचर भी कम है। 5 प्राइमरी टीचर और 3 मिडिल स्कूल में हैं। 
मिडिल स्कूल तक की इस शाला के हेड मास्टर आई.पी. सोनी है जो नवम्बर में सेवा निवृत भी हो जाएगे। उनका कहना है कि यहां की इमारते भी अग्रेंजो द्वारा ही बनवाई गई है। उन्होंने 1955 से 64 तक इसी स्कूल में पढ़ाई की है। वह भी टोपी लगाकर स्कूल जाते रहे। उनके रिकार्ड के अनुसार पूरे स्कूल में मात्र 2 बच्चें सामान्य से और बाकि सभी पिछड़ी जाति के हैं। यहां पहले से बच्चे कम हुए है, इसका कारण यही है कि हर 1 किलोमीटर पर प्राइमरी और हर तीन किलोमीटर पर मिडिल स्कूल पर खोला जा रहा है। कंप्यूटर के लिए टेक्निकल टीचर नहीं है। 6 कंप्यूटर स्कूल में पड़े खराब हो रहे है। उसमें सरकारी तौर पर रेड हैट इन्सटॉल किया गया। जो किसी के पल्ले नहीं पड़ता। वहां के अन्य शिक्षकों को इसके बारे में तनिक भी जानकारी नहीं है। जिसे सरकारी तौर पर प्रशिक्षित किया गया। उनका तबादला कर दिया गया। मध्यान भोजन से भी कोई खास लाभ नहीं है। उनके अभिभावक सहयोग नहीं करते। ऐसी स्थिति में एबीएल स्कीम का आना कितना सार्थक हो सकता है। जरूरी यह नहीं है कि बस्ता लाए या न लाए। मूल बात यह होनी चाहिए कि पढ़ाई का स्तर क्या हो, बच्चा वहां से बाहर निकल कर कितना कामयाब होता है। प्रोत्साहन के तौर स्कीम चलाने से ज्यादा आवश्यक उन्हें सही रूप में लागू करना है। बच्चे अब अपने समय का सदुपयोग नहीं कर पाते। हर साल ट्रेनिंग में पढ़ाने की पद्धति बदलते रहना कारगर नहीं हो रहा है। टोपी के बारे में बताते हुए कहते हैं कि पंजाब में पगड़ी और गुजरात-राजस्थान में साफा जैसे ही बुनियादी शाला की टोपी का महत्व है। आई.पी. सोनी ने सरकारी शाला की खराब हालत को बया करते हुए कहा कि शिक्षा का स्तर उठाना है तो पुरानी शिक्षा पद्धति को साथ लेकर काम करना होगा।    

मंगलवार, 21 जून 2011

बदल दो जिंदगी

शिवा और अभिजीत तिहाड़ जेल में बंद कैदी के ये वो दो बच्चे हैं, जो अपनी नयी जिंदगी की तलाश सिस्टर सेलीन के साथ कर रहे हैं

तीन पहिये का साथ


हम रिक्शे पर सवार होकर अपनी मंजिल तक तो पहुंच जाते हैं | लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इन रिक्शे वालो की जिंदगी कैसे चलती है| पैसो और छोटी-छोटी बातों को लेकर आये दिन उनसे झड़पे होते तो हम रोज ही देखते हैं | उसी बीच दिन भर की मेहनत के बाद भी उन पर पुलिस के डंडे बरसते  भी देखा जाता है| इनके परिवार का जीवन कैसे चलता है, अगर यह बीमार हो जाये तो उस दिन क्या होगा?
इन सब के बारे में भी सोचने की जरुरत है| नोएडा में  एक रिक्शे वाले को बेवजह कुछ गुर्गो द्वारा परेसान किये जाने की घटना को देखकर केरल की रहने वाली 67 वर्ष की सिस्टर सेलीन ने उनकी मदद करने की ठानी जो 1965 में ही नून बन गई थी| अपने रिटायरमेंट के बाद जब वह वापस भेल स्कूल में प्राइमरी की  इंचार्ज बनी कर आई , तब 4 अक्टूबर 2005 को उन्होंने पहली बार लाटरी माध्यम से जरुरत मंदों को रिक्शा देना शुरू किया | जिसकी कीमत रिक्शेवाले पहले तीन माह में 50 रुपये देकर फिर धीरे-धीरे साल भर में पूरा बकाया अदा कर उसे अपना बना लेते हैं| सिस्टर का कहना है कि ऐसा करने से उन सब को यह नहीं लगेगा कि यह रिक्शा उनका नहीं है| इन रिक्शो कि गिनती आज ३०३ तक पहुंच गई है, जिनमें से 277 से ज्यादा रिक्शे वालो ने पैसे दे दिए हैं| सिस्टर के पास रिक्शे के पैसे किसी फंड या डोनेसन से नहीं आते हैं| यह नेक काम वह खुद और अपने सहयोगियों कि मदद से करती है| शुरूआत में कुछ पब्लिसर्स ने भी उन्हें मदद किया| सिस्टर का मानना है कि ऐसा करने से वह अपने लक्ष्य से भटकेंगी नहीं| ऐसे ही सामाजिक कामों से उन्हें इनाम के रूप में करीब ढाई लाख रुपये मिले, जिसे उन्होंने रिक्शे खरीदने के साथ उनके परिवार कि मदद में भी लगा दिए| सिस्टर को अपने जन्म दिन के तोफे के रूप में अरविन्द यादव जी से रिक्शा मिला और मंगलवार के दिन यह पहला रिक्शा किसी कि मदद के लिए दिया गया| यही कारण है कि हर महीने कि मीटिंग मंगलवार को एक टी पार्टी कि तरह राखी जाती है| जहां इन्हें ट्रेफिक रूल्स के साथ ही अच्चा इंसान बनाने कि सीख दी जाती है| बैंको में इनके अकाउंट खुलवा दिए जाते हैं| इससे आगे  बचत करने के साथ ही अपने मुश्किल दिनों के लिए जमा पूंजी इक्कठा कर पाते हैं| यहां पर इन्हें एक-दुसरे कि मदद करना भी बताया जाता है | रिक्शा वालो के साथ ही उनके परिवार का ध्यान भी सिस्टर रखती है | उनके बच्चो को भी पढ़ाती है | सुरेश नामक बुंदेलखंड वासी रिक्शा वाला कहता है कि सिस्टर कि मदद से आज यह रिक्शा हमारा है| वह हमें बताती है कि किसी के साथ भी बुरा व्यवहार मत करना| वह हमारे परिवार का भी ख्याल रखती है| अपना पैसा अब हम अकाउंट में जमा करते हैं| 
इसके अलावा सिस्टर ने तिहाड़ जेल में बंद कैदियों के 29 बच्चों को 1997 में 'आशा सदन' लायी, जहां इनके द्वारा ऐसे बच्चों को शरण दिया जाता है| नोएडा लाने का उद्देश्य उन्हें अच्छी शिक्षा और परवरिश देना है | सिस्टर का सपना उन्हें आत्म निर्भर और नेक इंसान बनाने का है |  यह वो बच्चे है जिनके मां-बाप किसी अपराध के कारन जेल में बंद है| इनके परवरिश कि पूरी जिम्मेदारी आशा सदन पर है | बाद में इन्हें आगे कि शिक्षा के लिए पहली आइपीएस महिला अधिकारी किरण बेदी कि संस्था 'इंडियन विसन फाउन्डेसन' भेज दिया जाता है | 
सिस्टर कहती है कि मुझे मदद करने कि प्रेरणा केरल में ही फादर वर्गीश से मिली| उन्हें सामाजिक कार्य के लिए नवरत्न अवार्ड से भी नवाज़ा गया और १०१ वोमेन बुक में भी उनका नाम शामिल किया गया| सिस्टर बताती है कि यह सब इतना आसान नहीं होता है| पहले तो रिक्शे वाले इस काम में रूचि नहीं ले रहे थे | अब तो संख्या बढ़ती जा रही है | पहले सेक्टर 17 फिर 33 और अब तो नजीबाबाद में भी रिक्शा देने कि यह कवायद शुरू हो गई है| अभी नजीबाबाद में 55 हज़ार रुपये इस मुहीम को शुरू करने के लिए दिए गए है | उन्होंने बताया कि मीडिया में खबर आने के बाद तीन रिक्शे के पैसे मदद के रूप में आ गए | अलग-अलग लोग हर बार मीटिंग और खाने कि व्यवस्था के लिया आगे आते रहते हैं | क्रिसमस भी सिस्टर इन्हीं लोगो के साथ मानती है| किसी अमुक ने उनपर रिक्शेवालों को क्रिसचन बनाने का आरोप लगाया| लेकिन सच को नहीं झूठ्लाया जा सकता है| एक भी ऐसा रिक्शे वाला नहीं मिला जिसने धर्म परिवर्तन किया हो| सिस्टर कहती है कि समाज सेवा का काम तो सरकार का है | अगर हम कर रहे है तो क्या गलत है| जो लोग किसी के लिए अच्छा नहीं कर सकते है तो चुप रहे, जो अच्छा काम कर रहे है उन्हें करने दे | यहां कोई भी मेरा नहीं है लेकिन सब अपने है| मैं तो इन सब को अच्छा इंसान बनाने कि कोशिश कर रही हूँ | यह जिम्मेदारी समाज कि भी बनती है कि वह रिक्शेवालो से ठीक से पेश आये|